तानाशाह किम जोंग एवं राष्ट्रपति ट्रम्प का कूटनीतिक मिलाप


डॉ.शोभा भारद्वाज

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद जर्मनी के बीचो बीच बर्लिन की दीवार खींच दी गई थी भाई से भाई , पिता से पुत्र , प्रियजनों से अपने सगे अलग कर दिए गये थे लोग दीवार के पास खड़े हो कर अपनों के लिए रोते थे। 25 वर्ष बाद जर्मन की मजबूत दीवार टूटी जर्मनी का फिर एकीकरण हुआ, अब जर्मनी प्रजातंत्र की राह पर चल कर फिर से मजबूत राष्ट्र बना। बर्लिन की दीवार टूट सकती है क्या नार्थ कोरिया और साउथ कोरिया के बीच की सुरक्षा परिषद द्वारा खींची गयी छह इंच की दीवार हटाई नहीं जा सकती ?
सात वर्ष पहले 28 दिसम्बर 2011 को किम जोंग ने पिता किम जोंग इल की हार्ट अटैक से मृत्यू के बाद उसने पिता की सत्ता सम्भाली थी इनके दादा किम सुंग थे ,सत्ता पर परिवार के लोगों का कब्जा रहा है किम को विरासत में आर्थिक बदहाली और बंद दरवाजों की राजनीति हासिल हुई थी ।बाहरी दुनिया में किम की अनेक कहानियाँ चर्चा में हैं जिनमें निर्दयी क्रूर किम अधिक मशहूर है उसके देश में परमाणु अविष्कारों का भी जिक्र होता रहता था वह रक्षा बजट पर सबसे अधिक बजट का 25 % खर्च करते हैं उनके पास आधुनिक हथियारों से लेस शक्ति शाली सेना है, हाईड्रोजन बम का सफल परिक्षण हुआ मारक क्षमता वाली मिसाईलें जिन्हें अमेरिका तक पहुंचाया जा सकता है और विनाशक हथियारों का प्रचार भी किम करता रहा है। पहले उसे सोवियत रशिया से मदद मिलती थी लेकिन उसके टूटने के बाद मदद बंद हो गयी उत्तर कोरियन के चेहरे सपाट भाव शून्य जुबान बंद है। मानवाधिकार की किम को परवाह नहीं है, कई अमेरिकन राष्ट्रपति किम के पिता से सम्पर्क करना चाहते थे लेकिन सम्बन्ध नहीं बने। 28००० अमेरिकन सैनिक एवं जंगी जहाजी बेड़ा साउथ कोरिया के पास के क्षेत्र की रक्षा के लिए तैनात है जिन पर होने वाला खर्च बहुत है। किम और अमेरिका में तीखी बयानबाजी जारी रहती है ,उत्तरी कोरिया ने प्रशांत महासागर में स्थित अमेरिकी द्वीप गुआम पर हमले की धमकी दी थी प्रति उत्तर में श्री ट्रंप ने कहा उनकी सेनायें उनसे निपटने के लिए हर समय तैयार है यदि नासमझी भरा कदम उठाया गया तो अमेरिका भी पीछे नहीं हटेगा, ऐसे में उत्तर कोरिया को ऐसी तबाही का सामना करना पड़ेगा जैसी दुनिया ने आज तक नहीं देखी । सीरिया की बर्बादी किसी से छुपी नहीं है ।
अनेक पाबंदियों के बाद भी किम जोंग महा शक्ति अमेरिका से दबता नहीं है क्योकि चीन का सदैव उसके साथ खड़ा दिखाई देना, चीनी कूटनीति का हिस्सा है। विश्व के कूटनीतिज्ञ जानते हैं चीन ही उत्तर कोरिया के तानाशाह को दबा सकता है चीन भी युद्ध नहीं चाहता। राष्ट्रपति ट्रम्प आसियान देशों के शिखर सम्मेलन के लिए फिलिपीन्स की राजधानी में भाग लेने आये उन्होंने अपने 12 दिन तक के साउथ एरिया के दौरे की शुरूआत जापान से शुरू किया । यहाँ हर चर्चा में नार्थ कोरिया और साउथ एशियन समुद्र में चीन का बढ़ता प्रभाव मुख्य था। जापान भी सैन्य दृष्टि से मजबूत होने की कोशिश में है, दुनिया के राजनेता परेशान थे विश्व किम की वजह से परमाणु युद्ध के खतरे की तरफ बढ़ रहा है परमाणु युद्ध विनाशकारी हैं नहीं चाहिए। किम भी जानता है परिणाम विनाशकारी होगा इसलिए अमेरिका उत्तरी कोरिया पर हमला नहीं करेगा केवल गोलबंदी कर डरायेगा। दूसरी तरफ दक्षिण कोरिया तरक्की पसंद देश है उसकी आर्थिक दौड़ प्रबल है जापान के बाद विश्व के बाजारों में काफी समय तक उसका वर्चस्व रहा है।
इसी बीच सुखद खबर मिला अमेरिकन राष्ट्रपति ट्रम्प ने उत्तरी कोरियन डिक्टेटर से आपसी मेल जोल से झगड़े सुलझाने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है किम वार्ता की टेबल पर आने को तैयार है पहलू बदलने में किम जोंग का जबाब नहीं। वार्ता से पहले वह गुप्त रूप से चीन गये सत्ता सम्भालने के सात वर्ष बाद किम की पहली विदेश यात्रा थी वह भी 13 डिब्बों वाली रेल गाड़ी में जिनपिंग से उनकी लम्बी वार्ता हुई किम के स्वागत के चित्रों से साफ़ लगता था किम शी जिनपिंग के सामने सोच में डूबे विनीत एवं दबाब में थे जिनपिंग किम को डिक्टेट कर रहे हैं क्या कहना है क्या करना है ?उनका व्यवहार रूखा था किम समयानुसार रंग बदलें में माहिर है। चीन संघर्ष को बढ़ावा नहीं देना चाहता वह उत्तरी कोरिया का सबसे बड़ा आर्थिक सहयोगी । चीन पर भी विश्व जनमत का दबाब निरंतर रहा है फिर भी उसने उत्तरी कोरिया की मदद जारी रखी वही ऐसा देश है जो अमेरिकन सेना की कार्यवाही से किम को बचा सकता है।
गेम्स डिप्लोमेसी- 2018 फरवरी प्योंगचांग में शीत कालीन ओलम्पिक खेलों में दोनों कोरियन देशों को पास आने का अवसर मिला। “एक संस्कृति एवं इतिहास “वाले दोनों देशों के नागरिक आपस में मिल कर रहना चाहते हैं। 8 फरवरी को ओलम्पिक गेम्स के उद्घाटन समारोह में दोनों देशों की टीमें कोरिया के एकीकरण का संदेश देते हुए संयुक्त झंडे तले परेड में शामिल हुई स्टेडियम में उपस्थित लोगों ने तालियों बजा कर उनका स्वागत किया। उत्तरी कोरियन टीम के साथ किम जोंग की बहन किम यो जोंग भी उद्घाटन समारोह के अवसर पर स्टेडियम में मौजूद थी एवं सबके आकर्षण का केंद्र थीं दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे इन उनके पास बैठे थे उनके पास ही अमेरिका के उप राष्ट्रपति के बैठने की व्यवस्था की गयी किम की बहन उसकी विश्वास पात्र है उसने भाई को जो रिपोर्ट दी वह तानाशाह को पसंद आई दोनों देशों ने मिलने का फैसला लिया।
1953 में हुए कोरियाई युद्ध के बाद दक्षिण कोरिया में कदम रखने वाले किम जोंग पहले उत्तर कोरियाई सत्तासीन नेता हैं। दोनों देशों के बीच केवल छह इंच की दीवार है लेकिन नफरत की दीवार विशाल थी अंतर्राष्ट्रीय सीमा एक कदम में पार हो गयी जबकि दोनों देशों के बीच240 किलोमीटर लम्बा और चार किलोमीटर क्षेत्र है इसे नो मैंन लैंड कह सकते हैं जिसे 65 के अंतराल के बाद किम ने पार किया दूसरी तरफ राष्ट्रपति मून उनके स्वागत में खड़े थे मून का हाथ पकड़ कर किम ने दीवार पार कराई। दक्षिणी कोरिया जाते समय किम के चारो तरफ उनके अपने कमांडों का जबर्दस्त घेरा था जबकि दूसरी तरफ से भी सुरक्षा का पूरा प्रबंध था किम को गार्ड आफ आनर दिया गया दोनों ने मिल कर पाम का पौधा लगाकर उसे नदी के जल से सींचा ,वहाँ पत्थर लगाया जिस पर नेताओं के नाम और शान्ति एवं खुशहाली का संदेश लिखा था, कुछ देर उन्होंने सीमा पर बने नीले पुल की तरफ जाकर अकेले बैठे कर वार्तालाप किया किम की नई भूमिका है ।
1910 में जापान ने किंगडम आफ कोरिया पर अधिकार कर लिया था वहाँ केवल राज ही नहीं किया उनकी संस्कृति को भी मिटाने की कोशिश की लेकिन द्वितीय युद्ध की समाप्ति के साथ जापान की कमर टूट गयी कोरिया में भी सरेंडर हुआ कोरिया दो हिस्सों में बट गया उत्तर कोरिया पर रूस एवं चांग काई शेख के चीन ने अधिकार कर लिया दक्षिण कोरिया पर अमेरिकन समर्थित ब्लॉग मित्र देशों का कब्जा था। उत्तर कोरिया में साम्यवादी तानाशाही है दक्षिण कोरिया में निर्वाचित राष्ट्रपति एवं एक सदनात्मक प्रणाली। उत्तर कोरिया ने अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए दक्षिण पर हमला कर राजधानी सियोल पर भी अधिकार कर लिया था हजारों लोग मरे थे, सुरक्षा परिषद के हस्ताक्षेप के बाद से जुलाई 1953 से बिना फैसले का युद्ध विराम घोषित किया गया। युद्ध विराम करवाने में नेहरू जी का भी योगदान रहा था ।शीत युद्ध काल में दोनों कोरियन देश अपने शुभचिंतकों पर आश्रित थे । आज दक्षिण कोरिया आर्थिक दृष्टि से समृद्ध है। अब समुद्र में नौसेना में झड़पें होती रहती हैं लेकिन सेनायें कागज पर ही लड़ रही हैं दोनों देशों के नागरिक सीमा पार कर आ जा नहीं सकते उत्तरी कोरिया का नागरिक या सैनिक सीमा पार करने की यदि कोशिश करते हैं उनकी अपनी सेना उनको गोलियों से छलनी कर देती है ।
मानवाधिकार का उल्लंघन आम बात है किम की नीति उग्र राष्ट्रवाद एवं सैनिक ताना शाही की है मीडिया पर रोक है अखबार भी सरकारी है जिन्हें सार्वजनिक स्थानों पर चिपका दिया जाता हैं तीन चैनल हैं जिनके माध्यम से सरकार द्वारा जितनी सूचना देनी है दी जाती है। खास खबर पढ़ने का सम्मान एक महिला सीनियर सिटीजन को दिया जाता है । विदेशी पत्रकारों को उतनी ही दूर तक जाने की इजाजत है जितना वहाँ की सरकार दिखाना चाहती है सेल फोन ले जाना चित्र खींचने की इजाजत नहीं है ।विदेशी मेहमानों के लिए होटल है लेकिन खाली ।उत्तर कोरिया स्वयं को समाजवादी व्यवस्था द्वारा आत्म निर्भर देश बताता है अन्य तानाशाह देशों के समान चुनाव की प्रक्रिया भी दोहराई जाती है। यहाँ की कैपिटल और सबसे बड़ा शहर प्योंगयांग है शहर की प्रमुख सड़कों पर अच्छी बिल्डिंग दिखाई देतीं हैं लेकिन पीछे हाल बेहाल है। लोग अपने घरों के सामने कुछ सब्जी आदि उगा लेते हैं पौष्टिक आहार की कमी है । पिता किम जोंग इल को जब देश में खाने पीने की कमी महसूस होती थी दक्षिण कोरिया को डरा कर उससे जरूरत की वस्तुयें वसूली जाती थीं वहाँ की सरकार मानवता के नाते ट्रक भर कर भेज देती थी ।सरकार विदेशों में ठेके लेती है लेकिन उत्तरी कोरिया के मजदूर केवल भोजन पर काम करते हैं अर्थात फ़ोर्स लेबर पेमेंट सरकारी खाते में जाता है आवाज उठाने का अर्थ मौत है । दूसरे छोटे देशों को हथियार बेच कर फंड जुटाया जाता है । अच्छी स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव है लोगों के चेहरे सपाट भाव शून्य है।
कुछ शर्तों के साथ ट्रम्प और किम की वार्ता की तिथि निश्चित की गयी जिसमें दक्षिणी कोरिया के राष्ट्रपति मून का भी हाथ है । पहली बार विश्व के नीतिकारों ने जाना किम के पास अपना सुविधाजनक प्लेन भी नहीं है पुराना रशियन प्लेन है जिससे वह लम्बी यात्रा नहीं कर सकता इसलिए पहले वह चीन गयेवहाँ से सिंगापुर उनके साथ उनकी बहन , रक्षको का काफिला एवं प्रतिनिधि मंडल भी था ट्रम्प और किम अलग होटलों में ठहरे लेकिन उनकी दूरी केवलएक किलोमीटर थी दोनों राष्ट्राध्यक्ष कड़ी सुरक्षा के बीच रहे सिंगापुर पूरी तरह से सुरक्षित देश है यहाँ पुलिस नजर नहीं आती लेकिन सीसीटीवी कैमरोंद्वारा गहन निगरानी होती है । जिन होटलों में दोनों राष्ट्राध्यक्षों के रहने की व्यवस्ता की गयी है उधर की सड़क बंद कर दी गयी सिंघापुर के सुरक्षा गार्डनिगरानी कर रहे थे
श्री ट्रम्प की शर्त एवं अमेरिकन दबाब में पहले विदेशी पत्रकारों की उपस्थिति में उत्तरी कोरिया के एटमी ठिकाने नष्ट किये गये मजबूरी, उसने महसूस किया यदि अपनी गद्दी बचाए रखनी है अमेरिका से सम्बन्ध सुधारने चाहिए इससे उसके देश पर लगी आर्थिक बंदिशों खत्महो सकती हैं साउथ कोरिया से भी आर्थिक मदद मिलेगी । अमेरिकन सेनाये साऊथ कोरियन समुद्र से हट जायेंगी । ट्रम्प किसी भी तरह किम से वार्ता को सफल बनाना चाहते थे अमेरिकन नीतिकार मानते हैं किम चीन के अधिक नजदीक है उसका 90% सामान चीन से आता है खास कर रसायन एवं पेट्रोलियम । चीन विश्व में अपना आर्थिक साम्राज्य बढ़ाना चाहता है यदि किम को अपने पाले में लाना सम्भव न हो वह तटस्थ बना रहे ।ट्रम्प 36 घंटे पहले सिंगापुर पहुंच गये 71 वर्ष के ट्रम्प 34 वर्ष छोटे कद के किम । दोनों ने हाथ मिलाये यह हैंड शेक 12 सेकेंड चला ट्रम्प ने अपनी आदत के अनुसार किम की पीठ पर हल्की थपकी भी दी किम भी कम नहीं हैं उन्होंने भी राष्ट्रपति को थपकी दी । दोनों ने सीधे 90 मिनट तक बात की जिनमे 45 मिनट दोनों में अकेले वार्तालाप हुआ केवल उनके साथ ट्रांसलेटर थे ।दोनों जब बाहर आये किम सोच मग्न थे उनकी हंसी फीकी थी ट्रम्प के चेहरे पर भी गम्भीरता थी लेकिन वह सहज दिखने की कोशिश कर रहे थे दोनों ने हाथ हिलाये , उनकी 45 मिनट सबके बीच सीधी वार्ता भी हुई । अमेरिका क्षेत्र को एटमी हथियारों से मुक्त बनाने का इच्छुक है ।किम पूरा दिन होटल के कमरे में बैठा रहा हाँ रात नों बजे सिंगापूर का कसीनों एवं जापानी रेस्टोरेंट देखने गया।
किम नें एटमी हथियारों को नष्ट करेगा स्पष्ट हामी नहीं भरी लेकिन उसे ट्रम्प से बहुत कुछ चाहिए । आपसी सम्बन्ध जल्दी नहीं सुधरेंगे अभी तो दो राष्ट्राध्यक्ष आमने सामने पहली बार आये हैं । किम को ट्रम्प ने अमरीका आने का न्योता दिया ।ट्रम्प की जरूरत है किम से कई समझौते हो जायें वह इतिहास में शान्ति दूत की छवि बनाना चाहते हैं । किम मजबूर हैं उसने कूटनीति का परिचय देते हुए रंग बदला है किम सिंगापुर के समान ही अपने देश को आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न बनाने का स्वप्न भी देख रहा है । उसका पड़ोसी देश जापान की भौगोलिक मजबूरी जापान के प्रधान मंत्री शिंजो आबे की नजर उत्तरी कोरिया पर है वह पूर्ण तया परमाणु निरस्त्रीकरण चाहते हैं जापान के ऊपर से उत्तरी कोरिया द्वारा चलाई गयी मिसाईल गुजरी थी ।
आस्ट्रेलिया न्यूजीलेंड भारत एवं मयन्मार सभी समझते हैं उत्तरी कोरिया के पाला बदलने पर चीन का दबदबा घटेगा । साउथ और उत्तरी कोरिया के लोग पास आना चाहते हैं सम्बन्ध बनने पर उत्तरी कोरियन को छह इंच की दीवार के पार काम मिलेगा उनकी माली हालत सुधरेगी यहाँ 35 वर्ष की उमर के लोग अधिक हैं जबकि दक्षिण कोरिया की जेनरेशन बूढ़ी हो रही है रूस अपना प्रभाव मध्य एशिया के देशों पर बढ़ाने का सदैव से इच्छुक रहा है वह भी किम से नजदीकियाँ बढ़ाना चाहता है उसने भी किम को अपने यहाँ आने का न्योता दिया । विश्व के बड़े देशों की किम में रूचि बढ़ रही है कहीं वह पूरी तरह अमेरिका के समीप न चला जाए लेकिन किम तीसरी बार चीन की यात्रा पर गये हैं ।

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