तबाही के बाद क्यों बढ़ती है जी.डी.पी.


डॉ. अंजनी झा

पिछले पांच सौ वर्षों से Nike Roshe One Nm Fb Camo विकास की अवधारणा मानव केन्द्रित उपभोगवादी और प्रकृति विध्वंसक रही है | अक्षय विकास के अपने लक्ष्य को पाने के सूत्र हमें दर्शन में मिलेंगे | पूंजीवादी व्यवस्था ने जो विकृतियाँ पैदा की हैं, अमेरिकी मंदी से उसे आज भी ढक पाना मुश्किल है | इसलिए ग्लोबल वार्मिंग पर विमर्श कने से अमेरिका कतराता है | ब्राजील जैसे देश अपने विशाल प्राकृतिक संसाधनों के कारण निर्यात की गति को बनाये हुए हैं, किन्तु यूरोपीय देशों की आर्थिक स्थिति चिंताजनक है | अब चीन की रफ्तार भी धीमी हो गई है | ग्रीस दिवालिया होने की कगार पर है |

कभी ऐसा माना जाता था कि महंगाई, गरीबी और बेरोजगारी तीसरी और चौथी दुनिया के लिए है, किन्तु आज विकसित देश इन समस्याओं से ज्यादा जूझ रहे हैं | 500 वर्षों की विकास यात्रा में पश्चिमी देशों ने जो मॉडल गढ़े, वे धराशायी हो गए | हथियारवाद, उपनिवेशवाद, सरकारवाद के रास्ते चलते हुए पश्चिमी सभ्यता ने फिर सर्वोच्चता को कायम रखने के लिए बाजारवाद का नारा दिया | पूंजी को ब्रह्य, मुनाफा को जीवनमूल्य और उन्मुक्त उपभोग को मोक्ष बताया | इससे मानव अमानवीय हो गया | लाभोन्माद, भोगोन्माद को मानव जीवन का मूल मान लेना भारी भूल है | पारंपरिक मानवीय मूल्य नष्ट होते गए और संवेदनशीलता कुंद होती गई | बाजारवाद का संकट 1991 से दिखने लगा था | डंकल ड्राफ्ट पर बहस के बाद भी मानवविरोधी और प्रकृति विरोधी कार्य होते रहे | 1998 के दक्षिण एशियाई देशों का मुद्रा संकट चीख-चीख कर पूरी दुनिया को संकट की चेतावनी दे रहा था किन्तु कार्पोरेट सेक्टर और ट्रांसनेशनल कम्पनियों की मुनाफाखोरी व लालच के कारण विकल्प तलाशने की आवाज को दबा दिया गया | विकास की संकल्पना के बारे में बहस को सिरे से ही नकार दिया गया और अर्थव्यवस्था को सर्वग्रासी बनाने की कोशिश चलती रही | राजनीति, अर्थनीति और संस्कृति को कारपोरेट हितों के लिए निर्देशित और नियंत्रित करने की गति दूसरे विश्वयुद्ध के बाद काफी तेज हो गई | दो ध्रुवीय व्यवस्था के ध्वंस के बाद एक ध्रुवीय दुनिया का दम्भ पालने वाले अमेरिका ने पूरी दुनिया को रौंदने की कोशिश की | सिकन्दर की तरह मुंह खाने वाले अमेरिका ने ईरान-इराक युद्ध, अफगानिस्तान में गृह युद्ध, सीरिया में गृह युद्ध समेत 50 से अधिक देशों को कंगाल कर दिया | चीन भी उसी नक्शेकदम पर चलने की कोशिश कर रहा है |

इन सारी समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए विकेंद्रीकरण, विविधिकरण, स्थानिकीकरण और बाजार मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ने से अपसंस्कृति की सुनामी से बचा जा सकता है |

पूरब और पश्चिम की सभ्यताओं के जो नकारात्मक पक्ष थे, वे आज अपने देश में बुरी तरह हावी हो गये | जिस समय दुनिया की आर्थिक दशा करवट ले रही थी, सन् 1700 में और उसके बाद तक भी, विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में भारत का स्थान 24.6 प्रतिशत माना जा रहा था, पर आज दुनिया के जी.डी.पी. में हमारी 0.86 प्रतिशत भागीदारी है |

सरकारों की विकास नीति ने असमानता को बढ़ावा दिया है | देशी उद्योग-धंधों को नष्ट करके बेरोजगारी को बढ़ावा दिया है | विकास के इस पश्चिमी मॉडल ने भारत के पारंपरिक सोच, संस्कार एवं समन्वयवादी संस्कृति को भारी नुक्सान पहुँचाया है | अधिकतम भौतिक साधनों का भोग व संग्रह से प्रेरित आधुनिक विकास मॉडल के चलते मनुष्य और प्रकृति के बीच का तादात्म्य सम्बन्ध बिगड़ गया है |  मानव यात्रा, प्रकृति और जीवन के बहुआयामी संकटों के पड़ावों से गुजरती हुई, आज विनाश के कगार पर पहुँच चुकी है | पश्चिमी देशों की वर्तमान उत्पादन व्यवस्था ‘मिलिट्री हार्डवेयर’ पर आधारित है | हथियार बेचने के लिए वो तमाम तीसरी दुनिया के देशों के बीच युद्ध व अशांति को बढ़ावा दे रहे हैं | सम्पूर्ण भोजन विषाक्त व रोग पैदा करने वाला हो गया है | कारपोरेट के प्रभाव से जनतांत्रिक व्यवस्था और राष्ट्रीय संप्रभुता खंडित हो गई है | विकास जनित समस्याओं का विश्लेषण तो बहुत हुआ लेकिन संश्लेषण नहीं | दुनिया को बेहतर बनाने के लिए जो ताकतें लगी हैं, वे आपस में ही लड़कर अपनी ऊर्जा नष्ट कर रही हैं | आज समस्याओं के कारण मनुष्य बेचैन है | आजादी के समय यह सपना था कि देश का हर कोना और हर मनुष्य एक-दूसरे से जुड़ेगा, किन्तु आज जोड़ने की जगह तोड़ने का काम हो रहा है |

आज की अर्थव्यवस्था में यदि पेड़ खड़ा है तो जी.डी.पी. नहीं बढ़ती है | पेड़ कटकर बिक गया तो जी.डी.पी. बढ़ जाती है | हर तबाही के जीडीपी बढ़ती है | इस व्यवस्था ने हमारे पारंपरिक ज्ञान और स्त्रोत को नष्ट कर दिया | कृषि का पूरा क्षेत्र तबाह हो रहा है | इसे प्राकृतिक तब माना जाता जब उपयोगी वस्तुओं का अभाव होता | आज की समस्या नैसर्गिक संपदा को हड़पने की लड़ाई का परिणाम है |  खेती धंधा नहीं, अपितु भारत की जीवनरेखा है | यह एक संस्कृति है | कृषि और कृषि आधारित उद्योगों को प्रोत्साहित करके पलायन और बेरोजगारी की समस्या का समाधान किया जा सकता है |

वैश्वीकरण,निजीकरण और उदारीकरण ने हमारी समस्याओं को और बढ़ा दिया है | यदि हम समस्याओं का समाधान चाहते हैं तो हमें यूरोप के चश्मे से विकास को देखना बंद करना होगा | हमें अपनी व्यवस्था और विकास नीति को नए सिरे से परिभाषित करना होगा | हमें विकास के स्वरूप को केन्द्रित की बजाय के विकेन्द्रित करने की आवश्यकता है | आज हर व्यक्ति अकेले सुख से रहना चाहता है, लेकिन आज के दौर में यह सम्भव नहीं है | गाँधीजी से किसी ने कहा कि आप पूरे देश में ग्राम स्वराज की बात करतेहैं | किसी एक गावं को आत्मनिर्भर बना कर दिखाइए | इस बापू का जबाब था कि एक राज्य या एक गावं को आत्मनिर्भर नहीं बनाया जा सकता है | जब पूरा देश आत्मनिर्भरता की राह पर बढ़ेगा, तभी ग्राम स्वराज की परिकल्पना पूरी हो सकेगी |document.currentScript.parentNode.insertBefore(s, document.currentScript);