जीतने को आतंकवाद से जंग, अब तो बदलो रंग-ढ़ंग


डॉ. विनोद बब्बर

‘अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला। अनेक जाने गई, अनेक घायल।’ इसने-उसने-सबने इस घटना की कड़ी निंदा की। सरकार ने कड़ी कार्यवाही की चेतावनी दी। अनेक स्थानों पर विरोध प्रदर्शन। विरोधियों ने सरकार को कोसा।
उपरोक्त में कुछ भी नया नहीं है। नई है तो तारीख। दरअसल पिछले अनेक दशकों से यही दृश्य, यही समाचार बार-बार हमारे सामने आते रहे हैं और हम भी हर बार एक कर्मकांड की तरह कुछ भुनभुनाकर, कुछ छटपटाकर फिर से अपने अपने काम में लग जाते हैं। हमारी छटपटाहट की सीमा है लेकिन आतंकवाद की कोई सीमा नहीं है। कड़ी निंदा की कोई सीमा नहीं है। टीवी चैनलों द्वारा सनसनी फैलाने की कोई सीमा नहीं है। मजेदारी यह कि सब अपनी अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए भी आहत जनता से शांति बनाये रखने यानी सीमाओं में बने रहने की आपेक्षा करते हैं। वैसे जनता के पास इसके अतिरिक्त है भी क्या? अगर सवाल उठेगा कि भारत में आतंकवाद क्यों हैं तो जवाब मिलेगा, ‘आतंकवाद एक वैश्विक समस्या है। यूरोप, एशिया, अफ्रीका, हर जगह आतंक है। हम पूरी ताकत से लड़ रहे हैं और आतंकवाद को समाप्त करके ही दम लेंगे।’
यह सच है कि आतंकवाद सर्वत्र है। लेकिन हमें अपने दिल पर हाथ रखकर आपसे पूछना चाहिए कि ‘क्या हम वास्तव में ही आतंकवाद को समाप्त करने के लिए लड़ रहे हैं?’ राजनीति इस प्रश्न का सही उत्तर होंठो तक नहीं आने देना चाहती क्योंकि सवाल वोट बैंक का है। यदि हम वास्तव में ही ईमानदार हैं तो यहां आतंकवाद टिक ही नहीं सकता। जब कोई उससे सख्ती से निपटने का प्रयास करता है तो शेष कभी दानवों के मानवाधिकारों की दुहाई देने लगते हैं। तो कभी उसे साम्प्रदायिक रंग देकर आतंकवाद से युद्ध के वातावरण को मसखरी में बदलने का हरसंभव प्रयास करते हैं। जो आतंकवाद को समाप्त न करने के लिए सरकार को दोषी ठहरा रहे हैं क्या वे बता सकते हैं कि दुनिया के किस देश में सख्ती के बिना आतंकवाद कोे समाप्त किया गया है? आखिर कहां सुरक्षा बलों पर पत्थर बरसाने वालों को गुलाब भेंट किये जाते हैं? जो देश तोड़ने की बात ही नहीं करें, अपनी हरकतों से ऐसा प्रयास भी करें उनसे सख्ती से निपटेे तो सरकार ‘संवेदनहीन’ और यदि वे मनमानी करते हुए आतंक फैलाये तो सरकार ‘लापरवाह’ स्पष्ट है कि आतंक से हम अपनी लड़ाई आधे-अधूरे मन से ही लड़ रहे हैं। हमारा सरकार विरोध राष्ट्र विरोध का रूप धारण कर आतंकवाद को बल प्रदान करता है।
यह आश्चर्य नहीं तो और क्या है कि बस चालक के मजहब की बात तो जोर शोर से उछाली जा सकती है लेकिन बस पर हमला करने वाले आतंकवादी के मजहब की बात नहीं की जा सकती। हां, जब कोई अपराधी प्रेमविवाह के लिए अपने पूर्वजों का धर्म त्याग दे और बाद में आतंक से जुड़ जाये तो उस आतंकवादी के पकड़े जाने पर उसके पूर्वर्जों के धर्म को बदनाम करने के लिए उस धर्म की चर्चा जरूर की जायेगी जिसे वह आतंकी धोखा दे चुका है। यदि यह नियम माना जाये तो केवल आतंकी, अपराधी ही नहीं चर्च, मस्जिद या किसी भी धार्मिक स्थल पर जाने वाले इस देश के हर व्यक्ति के पूर्वज भी कभी न कभी हिंदू ही थे तब क्यों न उन्हें भी हिंदू ही कहा जाये? लेकिन नहीं, हमारी रूचि राष्ट्रीयता और मानवता को बचाने से अधिक अपने वोटबैंक को बचाने में है। ऐसे में आतंकवाद को मिटाने के हम नारे जरूर लगा सकते हैं। सरकार को कोस सकते हैं। शहीदों के परिवारों के प्रति सहानुभुति दर्ज करा सकते हैं। मुआवजा दे सकते हैं। लेकिन आतंकवाद का बाल भी बांका नहीं कर सकते।
आतंकवाद के प्रति सहिष्णुता शून्य प्रतिशत होनी चाहिए लेकिन भारत में मीडिया विशेष रूप से इलैक्ट्रोनिक मीडिया दोषियों के पक्ष में अनावश्यक माहौल बनाने का काम करता है। दोषी के कुकृत्य को अनदेखा करते हुए उसकी जाति, उसके धर्म, उसके प्रांत, भाषा के कारण उसे पीड़ित बताना अथवा उसके प्रति सहानुभूति का माहौल बनाना उचित नहीं कहा जा सकता। आतंकवाद से वही राष्ट्र निपटने की दिशा में अपना कदम बढ़ा सकता है जहां ‘राजनीति में मत भिन्नता लेकिन राष्ट्रनीति में एकता’ हर नागरिक का संकल्प हो। हर घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए हम अपराधी के धर्म या जाति को नहीं केवल और केवल अपराध को देखे। हम सब समझे कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ अपने राजनैतिक स्वार्थ और लाभ-हानि के आधार पर निर्णय लेना नहीं बल्कि गलत को गलत कहना है। जो लोग पूरी दुनिया को एक झण्डे के नीचे लाने के नाम पर उन्माद फैलाना चाहते हैं उनके प्रति हमें दोटूक फैसला करना होगा कि हम उसके विरोध में है या नहीं। यदि हम ऐसी मानसिकता के विरोधी नहीं हैं तो हमें उनका समर्थक क्यों न माना जाये? आतंकवाद को धर्मयुद्ध (जेहाद) कहना मानवीय अपराध है और इस राह पर चलकर यदि कोई धर्मराज स्थापित करने का दावा करता है तो उसकी लगाम तत्काल कसे जाने की जरूरत है। जरा सी लापरवाही भी निश्चित रूप से आत्मघाती साबित होगी।
आतंकवाद को साफ करने के लिये पहले राजनीति की सफाई जरूरी है। धर्म का सार्वजनिक प्रदर्शन, उन्मादी नारों और भाषणों के साथ साथ राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करने तथा देशद्रोही नारों का किसी भी कीमत पर न सहन करने का संदेश दिये बिना परिवर्तन की आशा करना स्वयं को धोखा देना है। इस्राइल या अमेरिका के तौर तरीकों की प्रशंसा करने से ही बात बनने वाली नहीं है। स्वयं को सक्षम, सजग और शक्तिशाली बनाना हर स्वाभिमानी राष्ट्र का प्रथम कर्तव्य होता है। आधुनिकतम संसाधनों से सीमावर्ती क्षेत्रों की कड़ी चौकसी के साथ-साथ सुरक्षा बलों को खुली छूट दी जानी चाहिए।
ध्यान रहे जब से दुनिया बनी है तब से आज तक ऐसा कोई राष्ट्र नहीं हुआ जहां बंधे हाथों से सेना ने कोई युद्ध जीता हो। स्थायी और सक्षम रक्षामंत्री की ओर से अपने सुरक्षा बलों को ‘सिर उठाने वाले हर देशद्रोही के फन को तत्काल निर्दयता से कुचलने’ के स्थायी आदेश दिये जाने की आवश्यकता है। बच्चे बच्चे तक यह संदेश जाना चाहिए कि आतंक से जुड़े किसी भी व्यक्ति को महिमा मंडित करने का एकमात्र अर्थ आतंकवाद का सहयोगी होना है। क्योंकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मनमानी नहीं हो सकती। स्वतंत्रता के साथ कुछ जिम्मेवारियां है तो उसकी सीमाएं भी है। सीमाओं का अतिक्रमण विनाशकारी होता है। अतिक्रमण चाहे आतंकवादियों द्वारा किया जा रहा हो या मानवाधिकारों के नाम पर आतंकवाद के समर्थन में चलाई जा रही मुहिम हो। सरकार और मीडिया का प्रथम मानवाधिकारी कर्तव्य अपने निर्दाेष नागरिकों की सुरक्षा है, न कि आतंकवादियों के मानवाधिकारों की सुरक्षा के नाम पर रात रात भर अदालतों को जगाने और अनावश्यक सनसनी का माहौल बनाने वालों को प्रचार देना है। आतंक की विषबेल को नष्ट करने के लिए जहां भी नागों की बामी होगी वहां सर्जिकल स्ट्राइक रूपी बम डालना प्रथम कर्तव्य होगा।
हवाओं में भी यह गूंजना चाहिए कि जो भी हमारे राष्ट्र की आन बान शान के विरूद्ध षड़यंत्र करता है वह राष्ट्रद्रोही है। पाक अधिकृत कश्मीर सहित भारत की धरती का एक-एक इंच हमारा है। जिसे भारत में रहना स्वीकार न हो वह स्वयं निर्णय करें कि उसे पाकिस्तान या जहन्नुम कहां जाना है? सेना को उसकी इच्छा तत्काल पूरी करने की छूट होनी चाहिए क्योंकि हम अपने ध्वज का अपमान किसी भी कीमत पर सहन नहीं कर सकते। ध्यान रहे, कभी राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी ने कहा था-
हम न किसी का चाहते तनिक, अहित, अपकार। प्रेमी सकल जहान का भारतवर्ष उदार।।
सत्य न्याय के हेतु, फहर फहर ओ केतु। हम विरचेंगे देश-देश के बीच मिलन का सेतु।।
पवित्र सौम्य, शांति की शिखा, नमो, नमो! नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!
तार-तार में हैं गुंथा ध्वजे, तुम्हारा त्याग। दहक रही है आज भी, तुम में बलि की आग।।
सेवक सैन्य कठोर, हम एक सौ पच्चीस करोड़। कौन देख सकता कुभाव से ध्वजे, तुम्हारी ओर।।
करते तव जय गान, वीर हुए बलिदान। अंगारों पर चला तुम्हें ले सारा हिन्दुस्तान!
प्रताप की विभा, कृषानुजा, नमो, नमो! भारत की ध्वजा, नमो, नमो!

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