जाने भी दो यारों पार्ट-2


श्री विनोद बब्बर

जाने भी दो यारों पार्ट-2

भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार एक बहुचर्चित और बहुविवादित शब्द है। दूसरा शायद ही कोई ऐसा शब्द हो जिसकी इतनी मनमानी परिभाषाएं हों। लेकिन न जाने इस शब्द में ऐसा क्या जादू है कि दूसरों का छोटे से छोटे भ्रष्टाचार तो दिखता है लेकिन अपना बड़े से बड़ा भ्रष्टाचार भी ‘जनसेवा’ प्रतीत होता है। दूसरों को मैदान से बाहर करने के लिए अपने तरकस में एक से बढ़कर एक अचूक तीर रखने वाले हमारे राजनैतिक ‘योद्धा’ उस समय ‘शीर्षासन’ करते नजर आते हैं जब अंगुली उनकी तरफ उठती है। धन्य है मेरे देश के वे नेता जो अपनी मैली चदरिया से ध्यान हटाने के लिए इतना कीचड़ उछालते है कि चादर तो क्या पूरा आसमान भी मैला नजर आने लगे। नित नये शगूफे छोड़ते नजर आने वाले नेताओं को ‘अनुभवी’ कहा जाता है लेकिन राजनीति में आने वाले नये नेता भी जब पुरानों के ‘कान काटते’ नजर आये तो मानना पड़ेगा कि बेशक हम स्वच्छता, विकास, शिक्षा में दुनिया के किसी विशिष्ट पायदान पर न हांे परंतु ‘भ्रष्टाचार’ शब्द के दुरपयोग में दुनिया में हमारा कोई सानी नहीं है।
जहां तक भ्रष्टाचार शब्द का प्रश्न है, यह भ्रष्ट आचरण का प्रतीक है। अर्थात् जब आपका आचरण आपेक्षित मर्यादा के अनुरूप नहीं है तो आपके आचरण को प्रशंसनीय नहीं माना जा सकता। यदि आप अपने कर्तव्यों के उचित निर्वहन की बजाय ‘पक्षपात’ कर रहे हैं अथवा ध्यान भटका रहे हैं तो आपका आचरण निश्चित रूप से ‘भ्रष्ट’ है। लेकिन न जाने क्यों हमने इसे रिश्वत तक सीमित कर महाभ्रष्टाचार के फाटक खोल दिये हैं। बात-बेबात शोर मचाने वाले यदि स्वयं पर स्वजनों के द्वारा लगाये आरोपों पर ‘मौन’ धारण कर तिकड़मों के जाल बुनते नजर आये तो कोई संदेह नहीं रहता कि दाल में कुछ काला है। परंतु आपके वे स्वजन जिन्हें आप कल तक ‘अपने हीरे’ कहा करते थे आज वही एक के बाद एक आपकी कार्यशैली, आपके व्यवहार पर सवाल उठा रहे हैं। आप शुचिता, ईमानदारी के जिन नारों की आंधी पर सवार होकर सत्ता की सीढ़ी चढ़े परंतु आसन पर विराजित होकर अपने विरूद्ध एक भी बात बर्दाश्त करने की क्षमता खो दें तो विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि पूरी दाल ही काली है। रिश्वत लेते हुए किसने देखा या नहीं देखा परंतु आपेक्षित आचरण से गिरते हुए आपको सभी ने देखा।
सत्ता के अनेक गुण हैं लेकिन सबसे बड़ा दुर्गुण है वह स्मरण शक्ति को प्रभावित करती है। शायद इसीलिए आपको भी स्मरण नहीं कि कभी आपने विधानसभा में ‘लोकपाल’ विधेयक पेश न कर पाने के कारण पद त्यागते हुए कहा था, ‘चुनाव जीतते ही विधानसभा का प्रथम अधिवेशन रामलीला मैदान में होगा जहां सबसे पहले लोकपाल विधेयक पारित कर कानून बनाया जायेगा।’ आपके इस वादे और इरादे से प्रभावित होकर दिल्ली की जनता ने आपको ‘छप्पर फाड़’ समर्थन दिया। अपनो को समाहित(एडजस्ट) करने की उलझन में कहां याद रहता है कि चुनावी दौर में क्या-क्या वादे और दावे किये थे। इसीलिए आपको यह भी कहां याद होगा कि आप बार-बार ‘राइट टू रिकाल’ की चर्चा करते थे। परंतु आपका अभिप्राय स्वयं के रिकाल से नहीं था इसीलिए आपने सारे विभाग दूसरों को बांट दिये और अपने पास केवल ‘गरियाने वाला मंत्रालय’ रखा। जब कोई जिम्मेवारी ही नहीं तो सीधे-सीधे गलती का प्रश्न ही नहीं। परंतु श्रेय पूरे का पूरा लिया जा सकता है। वैसे भी रिकाल अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए होता है। संयोग अथवा दुर्भाग्य से मिली सत्ता को छोड़े भी तो कैसे? हाँ, अपने मंत्रियों को ताश के पत्तों की तरफ अदल-बदल करते रहना ठीक है।
खैर यह संतोष की बात है कि आपको काम करना आता हो या न आता हो परंतु अपनी असफलता का दोष दूसरों के सिर मढ़ने में महारथ हासिल है। नगर निगम चुनाव में आप जिस कपिल मिश्रा की कार्यकुशलता के नाम पर वोट मांग रहे थे, वह केवल विश्वास के एक कथन का समर्थन करने के ‘महान अपराध’ के कारण आखिर कैसे और क्यों त्जात्य हो गया? आखिर बड़े-बडे़ दावे करने वालो को समझ में यह क्यों नहीं आता कि दूसरों के पाप गिनवाने से अपने पाप छिपाने अथवा माफ करवाने का अधिकार नहीं मिल जाता। विश्वास पाने के लिए स्वयं को भी विश्वसनीय होना चाहिए। सारा देश देख रहा था कि ’विश्वास को प्रभार, खान बाहर’ की स्याही सूखने से पहले ही आपने पर कतरने अर्थात् विश्वास के समर्थन में बोलने वाले अपने साथियों तक से छल का खेल शुरू कर दिया। अगर यह लोकतंत्र और ईमानदारी है तो माननीय मुख्यमंत्री जी, पलटवार को शुचिता का नवसंस्करण क्यों नहीं माना जाना चाहिए?
यह बात आप सहित हर दल को समझनी चाहिए कि कोई आपकी पालकी ढोने के लिए ही राजनीति में नहीं आता। अगर आप समाज सेवा का ढोंग कर मौज लेना चाहते हो तो अपने सहचरों, अनुचरों के लिए भी कुछ करों। शुचिता और सिद्वान्तवादिता का चोगा पहनने से ही आपकी प्रतिष्ठा सलामत रहने वाली नहीं है। वेश से व्यवहार तक सम्पूर्ण आचरण पारदर्शी होना चाहिए। आपसे आशायें लगाये समर्थक ही नहीं, निष्पक्ष और तटस्थ लोग भी आपसे अपने ही साथी के आरोपों का जवाब देने की आपेक्षा कर रहे थे उस समय आपने एक बार फिर से विधानसभा जैसे संवैधानिक मंच का उपयोग पाप को ढ़कने की असफल कोशिश में किया।
स्वयं को एकमात्र ईमानदार घोषित करने वाले केजरीवाल जी ने दिल्ली विधानसभा की बैठक से पूर्व ‘सत्यमेव जयते’ के दावे वाला ट्विट किया तो लगा शायद वे नैतिक जिम्मेवारी लेने का साहस दिखायेंगे। शायद करोड़ों लोगों की उम्मीदों को बचाने के लिए कम से कम जांच तक पद त्याग करेंगे। लेकिन रिश्वत के आरोपों का जवाब देने की बजाय ‘ईवीएम जैसी मशीन’ पर कुछ प्रयोग कर यह संदेश देने की कोशिश की गई कि इनमें छेड़छाड़ बहुत आसान है। आम आदमी पार्टी के बीटेक विधायक सौरभ भारद्वाज ने सीक्रेट कोड की चर्चा की जिसे कोई भी वोट डालते हुए आसानी से बदला जा सकता है जबकि चुनाव आयोग ने इसे गलत बताते हुए ईवीएम में किसी सीक्रेट कोड से ही इंकार किया है। यह सर्वविदित है कि मतदान के समय किसी भी मशीन का बटन केवल एक बार दबाया जा सकता है। जबकि नकली मशीन पर प्रयोग करने वाले केजरीवाल जी के हीरे ने स्वयं कहा है कि सीक्रेट कोड बदलने के लिए एक से अधिक बार बटन दबाना पड़ेगा। इससे स्पष्ट है कि स्वयं को बीटैक बताने वाले की डिग्री भी संदेह के दायरे में है। वैसे सौरभ भारद्वाज का दावा है कि यदि उसे तीन घंटे के लिए असली ईवीएम दे दी जाये तो गुजरात चुनाव में सभी सीटे ‘आप’ को ही मिलेगी भाजपा को एक बूथ पर भी बहुमत नही मिलेगा। हमारा सुझाव है कि चुनाव आयोग को सौरभ को मतदान मशीन देकर तीन घंटे कैमरे के सामने हैक करने का अवसर देना चाहिए। यदि वह ऐसा करने में सफल होते हैं तो चुनाव आयोग भंग कर नई वैज्ञानिक व्यवस्था की जाये। और यदि वे इसमें असफल रहते है तो मूल मुद्दे से ध्यान हटाने और संवैधानिक संस्थाओं के दुरपयोग तथा तंत्र का मज़ाक बनाने के लिए उनके और उनके दल के विरूद्ध कठोरतम कार्यवाही की जानी चाहिए।
नकली ईवीएम का मनमाना प्रदर्शन सार्वजनिक रूप से करने की बजाय विधानसभा को विशेषाधिकार की आड़ लेने के लिए चुना गया। क्या यहीं सत्य की जीत है? अपने निकटस्थ मंत्री जिसपर आप कल तक नाज करते थे उसके द्वारा रिश्वत के आरोपों पर चुप्पी और आपके निकटस्थों द्वारा सबूत मांगने पर आपको चिंतन करना चाहिए कि शीला दीक्षित पर आपके द्वारा लगाये गये आरोपों के सबूत कहां है? पंजाब के नेताओं पर आरोप लगाते समय सबूत प्रस्तुत करना आपने जरूरी क्यों नहीं समझा? क्या आप मानते है कि आपके द्वारा बिना सबूतों को सार्वजनिक किये आरोप लगाना आपकी गलती थी? अगर आप अपने लिए अलग तरह के मापदंडों की आपेक्षा करते है तो इस आचरण को भ्रष्ट नहीं तो आखिर क्या कहा जाये?
मान्यवर! एक नये प्रयोग के रूप में जनता द्वारा दिये गये प्रचण्ड बहुमत रूपी विश्वास को खंडित कर आपने लोकतंत्र का बहुत अहित किया है। आखिर आपका व्यवहार देखने के बाद अब कोई मतदाता राजनीति में ईमानदारी और शुचिता के नये वादे और दावों पर विश्वास कैसे करेगा? लोक तो उचित समय पर अपना निर्णय देगा ही लेकिन आपको बिना देरी किये बताना चाहिए कि लोकतंत्र से किये गये इस अक्षम अपराध के लिए आप स्वयं के लिए क्या सजा निर्धारित करते है? उत्तर की आशा तो नहीं है लेकिन कैसे कह दूं कि ‘तेरा इंतजार नहीं!’

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