जलदान


गीतिका वेदिका

वृद्ध पिता बालक को छोड़ मृत्यु को प्राप्त हुए। बालक के हाथों गाँववालों ने अग्निसंस्कार कराया। बालक जान भी नहीं सका कि ‘बाबा’ उसके पास नहीं रहे। वे तो हमेशा के लिये उसकी माँ के पास चले गए हैं। एक दो दिन तक बिन माता-पिता के नन्हे बालक पर भोजन की दया हुयी। अगले दिन हठ करके घर आ गया, किंचिंत घर में ही घर जैसा सुख है। घर आते ही ‘बाबा’ को पुकारा बाबा मुस्कुराते हुए सामने बैठे थे। बालक के मन में कोई प्रश्न नहीं आया लेकिन पिता के नए आदेश ने उसे विचलित कर दिया-“आज से भोजन तुमको ही बनाना होगा।” पिता की हर बात शिरोधार्य करने वाला बालक यह बात भी मुँह बनाते हुए मान गया। कष्ट उठाते हुए किंचिंत जली हुई किन्तु स्वादिष्ट बाटियाँ और आलू अंगारों पर सेंक, भोजन पिता के सम्मुख रख मनुहार किया-

“बाबा! आप भी खाओ।”

लेकिन बाबा ने “अब जीवन का निराहार चौमासा करने का प्रण लिया है सो जीवनभर कुछ न खा-पी सकूँगा।” कह के बालक को भोजन से निवृत्त होने का आदेश दिया और स्वयं आँगन में बंधी गैया-बछिया छोड़ने चले गए।
भोजन आदि से निवृत हो कर पिता-पुत्र ढोर चराने निकल पड़े। घर की गैया-बछिया समेत पिता गाँव भर के ढोर ले के जाते रहे थे, जिससे वर्ष भर का अन्न-प्रबन्धन होता था। रोज की तरकारी बेड़ा में लगे पौधों से प्राप्त होती थी। जलाऊ लड़की जंगल में दिनभर के विचरण से प्राप्त हो जाती थी।

बालक में यह गुण देख कर गाँववालों ने पैतृक-दायित्व सौंप दिया। बालक गाँववालों को बढ़ती उम्र का समझदार, दायित्वयुक्त और भला इंसान बनता दिख रहा था, जो अब दया पर नहीं बल्कि स्वयं के विवेक और श्रम पर जीने की कला सीख रहा था।

समय सुनहरे पंख लगा कर उड़ने लगा था। सुदर्शन बालक कैशोर्य की सीढ़ी पर गुण और सौष्ठव से परिपूर्ण हो चला था। अंतर्मुखी होना उसका विशेष गुण था। सुबह गाँव भर के ढोर ले जाता, जंगल से कंदमूल, लकड़ियाँ और उपयोगी पदार्थ लाता और छोटी सी झोपडी को समृद्ध करता। रात को भोजन बनाता खाता और सो जाता। बाबा सदैव उसकी प्रतिछाया बन के रहा करते। यद्यपि गाँव सदा किशोर के ही गुण बखान करता। पिता को सब विस्मृत ही कर चुके थे।

सब गुणों से युक्त किशोर पर लड़की के पिता की दृष्टी पड़ी तो किशोर को बुला कर विवाह की इच्छा जाननी चाही। किशोर ने “बाबा से पूछ कर आपको उत्तर दूंगा” बोल के घर की राह ली। लड़की के घर से निकलते समय किशोरी उसके सामने आ के ठिठक गयी थी। भावी दुल्हिन और भावी दूल्हे ने एक दूसरे पर क्षणिक दृष्टिपात किया। तत्पश्चात वह घर चला आया। घर पर पिता प्रतीक्षित थे-

“आज घर आते समय कहाँ चले गए थे? मैंने तुम्हे नहीं पाया तो अपने गैया-बछिया घर ले आया।”

“बाबा! पासगाँव के काका अपनी बिटिया रूपा से मेरे ब्याह को ले कर मेरी इच्छा जानना चाह रहे थे।”

“तुम्हारी क्या इच्छा है?”

“जो आप कहिये बाबा! आपकी आज्ञा ही मेरा जीवनधर्म है।”

“कन्या देखि है तूने?”

“उसके घर से आते समय वह सामने आ गयी थी।”

“ठीक है। अब ईश्वर चाहते हैं कि तेरा ब्याह हो।”

पिता की अनुमति मिली तो पुत्र ने भावी ससुराल में ‘हामी’ पहुँचा दी। वर की घरु स्थिति से परिचित वधूपक्ष ने कोई रीति रस्म से अपेक्षा न करते हुए स्वयं ही सारे रिवाज सम्पूर्ण किये। शिव-पार्वती के समक्ष सम्पन्न हुए विवाह पश्चात् विदाई हुयी। नववधू घर में प्रवेश कर रही थी। दूल्हे ने उपहार स्वरूप मिले कलश और वधू की लोहे की पेटी थाम रखी थी। वधू ने अचानक रोका और अपने पति को अपने हाथ में ली हुई पगड़ी दी। फिर स्वयं हल्दी भरे गठजोड़े का एक सिरा पति के कंधों पर रखते हुए दूजा सिरा अपने चारों ओर ओढ़ के पति के पीछे हो कर उसे अगुवानी करने को कहा।

गृहप्रवेश कर वधू ने अंदर चारों ओर दृष्टी की। अकेलेराम का घर भलीभाँति सजावट युक्त भले न था, किंतु व्यवस्थित था। कहीं भी अनावश्यक सामान नहीं था न ही कोई अनुपयोगी वस्तु। एक ओर रसोई में बर्तन थे उसी ओर आटे की मटकी और रसोई की अन्य वस्तुएं थीं। दूजी दीवार में भगवान का आला था जिसमें चंदन लगीं बटइयाँ थीं जिनके सामने मिट्टी का दीया धरा था। तीसरी दीवार में दर्पण कंघे समेत लगा था। एक कोने में सूखी लकड़ियों का ढेर था। कमरे में एक ओर खटिया पर कथरी बिछी थी, अरगनी पर कपड़े टँगे हुए थे, एक कथरी जमीन पर बिछी थी। सम्भवतः वह रूपा के लिये थी। पति ने भगवान के आले के समक्ष आ कर जीवनसंगिनी रूपा को बुलाया और कहा-

“बाबा! इसे ब्याह करके ले आया, बाबा को प्रणाम करो रूपा!”

रूपा ने माथे पर पल्ला लेते हुए भगवान को प्रणाम किया। रूपा ने देखा कि द्वार पर हेरते पति के मुख पर सौम्य मुस्कान है-

“अब घर की वधू आ गयी है तो बाबा बाहर ही रहा करेंगे।”

रूपा पति के हाथों से पगड़ी लेकर यथास्थान व्यवस्थित करने लगी थी-

“तुम थक गयी होगी, तनिक विश्राम करो। फिर मैं रात्रि भोजन तैयार करूँगा।”

कहते हुए नीचे बिछी हुयी कथरी पर बैठ गया।

“आप खाट पर बैठिए। मैं रात्रि भोजन की व्यवस्था करती हूँ।”

रूपा ने आते साथ अपने दायित्व की घोषणा कर दी।

भोजन तैयार कर, परोस कर रूपा पति को बुलाने आँगन में आई तो तुलसीचौरे के निकट पति के संझाबाती लगाते हुए सम्वाद सुने-

“बाबा! क्या जीवन के चौमासे में से एक साँझ भी भोजन नहीं कर सकोगे? रसोई से हींग के बघार की सौंधी सुगन्ध उठ रही है।”

फिर पति का मुस्कुराता हुआ चेहरा देखा। तो पुनः माथे पर पल्लू ढांक लिया।
बाबुल-गृह से पिया-गृह आते-आते अच्छे परिचित हो चुके पति-पत्नी अब तक अच्छे मित्र भी हो चुके थे। कुछ क्षणों पश्चात जीवन की मधुर रात्रि आगमन को उत्सुक थी। जिसकी औपचारिक व्यवस्था दोनों ने मिल के ही की थी। आकाश में चंदा चमक रहा था तो आँगन में तुलसीचौरे पर दीप जल और घर रूपा के रूप से प्रकाशित हो रहा था।
मधुर रात्रि जीवन की अन्य रात्रियों की अपेक्षा बहुत छोटी जान पड़ी। सुबह हो चुकी थी। पंछी अपने कलरव से आलिंगन में लिपटे जोड़े को जगाने लगे थे। पति अलसाया, किंतु रूपा उठ बैठी और खटके की आवाज़ से सर पर पल्लू रखते हुए बाहर आई तो गैया की रस्सी छूटी पड़ी थी लेकिन बछिया रस्सी से बंधी थी और उसके चेहरे पर चंचलता थी। अचानक उसकी रस्सी खुली और वह माँ के पास कुलाँचे मारते आ गयी। रूपा चकित थी। भोर में उषा की लालिमा से पूरब का आसमान लाल होने लगा था।

स्नानादि से निवृत हो कर घर के शेष कामकाज निपटाने के बाद पति को बेड़ा में लगी तरकारी की क्यारी में खुरपी करते देखा तो पूछ बैठी-

“आज ढोर चराने नहीं गए? विवाह के कारण अपने दायित्व से मुख मोड़ना उचित नहीं।”

“आज बाबा ने मुझे घर रुकने को कहा। ब्याह का पहला दिन है। बहू अकेली न रहे। फिर तो तुझे नित्य जाना ही है।”

पति ने मुस्कुरा के उत्तर दिया।
रूपा ने असहज भाव से पति को भोजन करने को कहा और प्रेम से खाना खिलाने लगी।

गौधूली बेला ने आकाश में सिंदूरी रंग भर दिया था। सांध्यवंदन का दीया उजियारते हुए रूपा ने धूल उड़ाती चली आ रही गाय-बछिया को देखा, आँगन के मुख्य द्वार स्वतः ही खुलते देखे। वह गैया को पानी रखने गयी तो गैया-बछिया को खूंटे से बंधे देखा। पति को आसपास न पाकर भय के मारे रूपा के माथे पर पसीने की बूंदे छलक आयीं और तेज़ हवा से उसका घूँघट खुल गया कि एक बुज़ुर्ग के खाँसी के स्वर ने उसके भय को बढ़ा दिया। वह आँचल को माथे पर रखते हुए भयमिश्रित स्वर में पुकार उठी-

“कौन? कौन है?”

“हम हैं बेटी! …तुम्हारे पति के पिता…तुम्हारे ससुर।”

तीव्र धड़कन सम्भालते हुये वह किंकर्तव्यमविमूढ़ हो गयी तभी पति को मुख्य द्वार से अंदर आते देखा और दौड़ के उनके हृदय से जा लगी। पति ने उसे मर्यादावश अलग करते हुए कहा-

“बाबा सम्मुख हैं रूपा!”

रूपा के सम्मुख अब तक सारी परिस्थितियां स्पष्ट हो चुकी थीं। पियागृह की द्वितीय रात्रि ही इतनी कौतुक भरी होगी, रूपा ने सोचा नहीं था। रात्रि का भोजन पति को खिला के और स्वयं खा के बिस्तर पर लेट गयी थी। एक दृष्टि से पति को देखा तो वह प्रसन्न और निश्चिन्त दिखे। मुस्कुराते हुए पति ने रूपा का हाथ हाथों में ले लिया-

“रूपा! तुम्हारे आगमन से यह घर कितना महक उठा है? बाबा! हमेशा मेरे लिये चिंतित रहा करते हैं। न जाने कब जीवन का चौमासा उनका आजीवन कठोर व्रत बन गया? किन्तु निष्ठा ने उनकी देह को टूटने नहीं दिया… रूपा! मैं हृदय से आभारी हूँ, तुमने इन दो दिनों में मुझे और इस घर को जो अपनापन दिया है, ऐसे लगता है जैसे तुम्हारे साथ मैं न जाने कितने जन्मों से हूँ?”

पति की भोली बतियाँ सुन कर रूपा का कंठ अवरुद्ध हो गया और नयन जलधाराएँ बहने लगीं। अब वह कोई भी प्रश्न नहीं पूछना चाहती थी।
भोर होने तक न जाने कितने मंथन से उतराती रही रूपा ब्रह्ममुहूर्त में उठ बैठी थी।

स्नानादि से निवृत हो के जल भरा लोटा लिए गैया के खूँटे के साथ पास बैठी थी कि ससुर ने खाँस कर अपनी उपस्थिति का आभास दिया। रूपा ने आँचल माथे पर रखते हुए उसी दिशा में पुकारा-

“पिताजी!”

“हाँ बेटी!”

“अब मत आया कीजिये।”

“क्यों बेटी?”

रूपा ने इस प्रश्न उत्तर ‘जलदान’ के रूप में दिया। वह स्पष्ट देख पा रही थी कि जल की गिरती धारा धरती को नहीं छू रही थी। लोटे से थोड़ा सा जल बचा के रूपा ने तुलसीजी को चढ़ा दिया था। भोर उठ के पति ने जब तक स्नान किया, रूपा ने कलेवा बांध दिया था। गांव के ढोरों के साथ अपने गैया-बछिया ले के गया पति आज संझा में वापसी पर संशय में घिरा प्रतीत हुआ। रूपा ने घर आती गैया-बछिया के लिये मुख्य द्वार खोला और गाय बांध दी।

“आज बाबा साथ नहीं थे रूपा! मन विचलित है। न जाने कहाँ गए वह? गांव में किसी से पूछ नहीं सकता, क्योंकि सब कहते हैं कि तेरे बाबा तो मर गए तेरे बाल्यकाल में ही और माँ तुझे जनते समय…!”

पति की बात सुन कर रूपा मुस्कुरा दी-

“आप हाथ-पाँव धो लीजिये। गैया आज से आपको दुहनी है। पिताजी के कार्य आपको सम्भालने होंगे और आप जो कार्य करते थे वह मैं किया करूँगी।”

रूपा जलघरा में जल भरा कलशा ले के पति के हाथ पैर धुलाने को तत्पर हो गयी। वह कितने ही चिंतन और चिंताएं पति के माथे पर स्पष्ट देख रही थी। इन चिंताओं को पालते हुए उनके ब्याह को एक महीने से ऊपर हो चला था। नियम से वह सुबह उठ के स्वयं ढोर छोड़ता, गाँव भर के ढोर एकत्र करता और जंगल में चराने ले जाता फिर संझा घर आते समय जंगल से सदा की तरह लकड़ियाँ लाता। गाँव के ढोर गाँव लाता फिर अपनी गैया-बछिया घर ला के बांधता और दुहता। रोटी का स्वाद रूपा की सुघड़ता में महक उठता। इसी क्रम में एक संझा जब वह ढोर चरा के जंगल से घर लौटा तो पाया रूपा के निकट दाई अम्मा बैठीं थीं। उनको प्रत्येक ग्रामवासी माँ की तरह आदर देता था। वह उन्हें घर में पाकर प्रश्नवाचक मुद्रा में देखने लगा-

“इसे क्या हुआ अम्मा?”

रूपा लजा के अपने पल्लू का छोर मुँह में दबा कर पति को पानी लेने जलघरा चली गयी। अम्मा के स्वर में संसार भर के आनन्द छलक रहे थे-

“तू बाबा बनने वाला है। जैसे तेरे बाबा को तू मिला वैसे ही तुझे भी नन्हा मिलने वाला है।”

वह आश्चर्य भाव में भर गया और अम्मा आशीष देती हुई चलीं गईं। रूपा के हाथ से जल गटागट पी के रूपा को असमंजस भरे भाव में देखता रहा और रूपा थी कि उसकी छाती में अपना मुख छुपाती जा रही थी-

“बाबा आपके साथ फिर से रहेंगे बाल गुपाल बन के।”

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1 Comment

  1. गीतिका वेदिका says:

    अच्छा मंच हैl उपयोगी चर्चाएं हैं मेरी कहानी को स्थान देने लिए धन्यवादl