‘जरूरी’ और ‘मजबूरी’ के बीच झूलती हमारी भाषायी संवेदना


डॉ. विनोद बब्बर

गत दिवस राष्ट्रपति जी ने केरल उच्च न्यायालय के एक समारोह में न्याय को जनता की भाषा में लाने के पक्ष में आवाज बुलंद करते हुए कहा कि उच्च न्यायालय अंग्रेजी में निर्णय देते हैं लेकिन जो लोग अंग्रेजी को अच्छे से नहीं समझ पाते उनके लिए न्यायालयों द्वारा स्थानीय भाषाओं में निर्णय की प्रमाणित अनुवादित प्रतियां 24 घण्टे में उपलब्ध कराई जानी चाहिएं। जब महामहिम राष्ट्रपति जी भारतीय भाषाओं पर हावी अंग्रेजी के तिलस्म को तोड़ने के पक्ष में आवाज उठा रहे थे लगभग उसी समय दिल्ली नगर निगम द्वारा अगले सत्र से अपने स्कूलों में पहली कक्षा से अंग्रेजी पढ़ाने का निर्णय सामने आया। प्रथम दृष्टया ये दोनो बाते परस्पर विरोधी प्रतीत होती हैं। कहा जा सकता है कि देश के सर्वाेच्च पद पर विराजमान व्यक्तित्व अंग्रेजी के स्थान पर भारतीय भाषाओं के पक्षधर है तो देश की सबसे बड़ी पार्टी के शासन वाले राज्य में अबोध बच्चों पर अंग्रेजी लादी जा रही है। गंभीरता से विचार किया जाये तो यह तथ्य हमारे सामने आता है कि राष्ट्रपति जी ने जो कहा वह ‘जरूरी’ है जबकि सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी पढ़ाने की बात ‘मजबूरी’ है।
दिल्ली सहित देश के महानगरों में पिछले कुछ दशकों में ‘पब्लिक स्कूल’ संस्कृति बहुत तेजी से फैली हैं। गली-गली निजी स्कूल खुल गये हैं जो ‘अंग्रेजी माध्यम’ होने का दावा करते हैं। यहां प्रवेश पाकर ‘गुड मार्निंग’ और एक-दो पाईम रटने वाले अपने छोटे-छोटे बच्चों को देख फूले नहीं समाते। इसे दुर्भाग्य कहे या मजबूरी लेकिन सत्य यही है कि केवल मध्यम वर्ग ही नहीं, निम्न-मध्यम वर्ग, यहां तक कि किराये के मकान में रहकर किराये का रिक्शे चलाने वाले, पटरीवाले भी अपने बच्चे को बेशक दबड़ेनुमा स्कूल ही क्यों न हो, लेकिन ‘अंग्रेजी’ माहौल से जोड़ना चाहते हैं। इसलिए यह कोई आश्चर्य नहीं कि दिल्ली नगर निगम के प्राथमिक कक्षाओं के छात्रों की संख्या दिल्ली के कुल छात्रों का एक चौथाई भी नहीं है। इसका सीधा-सीधा अर्थ यह है कि तीन -चौथाई से अधिक प्राथमिक कक्षाओं के छात्र पहली कक्षा से अंग्रेजी पढ़ रहे हैं या झेल रहे हैं।
यह जानते हुए भी कि ‘मातृभाषा में विद्यार्थी को अपना विषय समझने में सरलता और सुगमता होती है। जबकि विदेशी भाषा में विषय काफी समय तक समझ में नहीं आते या आधे- अधूरे ही आते हैं। उस पर अंग्रेज़ी की अवैज्ञानिक वर्तनी और उच्चारण को सीखने में वर्षों लग जाते हैं। समय-समय पर बनाये गये विभिन्न आयोगों ने भी अपनी सिफारिशों में इसी बात पर बल दिया लेकिन दुर्भाग्य की बात यह कि अपने- अपने समय में हर दल की सरकार ने इन सिफारिशों को ठण्डे बस्ते के हवाले करना ही उचित समझा।
एक विशेष बात यह कि अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करते हुए बच्चा अपनी संस्कृति और मानवीय मूल्यों के संस्कार संग देशभक्ति सहजता से ग्रहण कर लेता है।’ हम केवल उपरी मन से अपनी भाषाओं की बात करते हैं परंतु अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में भेजते हैं। उस पर तर्क यह कि ‘केवल मेरे बच्चे थोड़े ही पब्लिक स्कूल जाते हैं।’ या ‘केवल मेरे करने से क्या फर्क पड़ने वाला है।’
विशेषज्ञों के अनुसार, ‘विदेशी भाषा सीखना जितनी जल्दी शुरू किया जाए उतना बेहतर है, मातृ-भाषा विदेशी भाषा सीखने के राह में रुकावट है, विदेशी भाषा सीखने का अच्छा तरीका इसका शिक्षा के माध्यम होना चाहिए।’ को अंधविश्वास बताया है। जबकि वास्तविकता यह है कि मातृ-भाषा की मजबूत नींव से विदेशी भाषा बेहतर सीखी जा सकती है। यह सर्वविदित है कि आचार्य विनोबा भावे ने देवनागरी के माध्यम से अनेक विदेशी भाषाएं सीखी। विदेशी माध्यम से बालमन पर नकारात्मक प्रभाव ही पड़ता है। ऐसे में बच्चा ‘आधा तीतर, आधा बटेर’ होकर न तो ढ़ंग से मातृभाषा सीखा पाता है और न ही विदेशी भाषा।जहां तक राजकीय विद्यालयों का प्रश्न है, वहां प्रतिदिन मिड डे मील, मुफ्त पुस्तकंे, मुफ्त बस्ता, सर्दी में मुफ्त स्वेटर, कुछ वर्गों को आर्थिक अनुदान, वजीफा सहित बहुत कुछ दिया जाता है। इसके बावजूद दिल्ली नगर निगम के स्कूलों से मध्यम वर्ग पहले ही दूरी बना चुका है अतः वहां किस वर्ग के बच्चे हाजिरी लगाते हैं, यह कोई पहेली नहीं है। आरोप यह भी है कि कुछ लोग यहां अंग्रेजी लाने के इसलिए विरोधी है ताकि अंतर बना रहे। लेकिन वास्तविकता यह है कि जो लोग इन चन्द अंग्रेजी रहित स्कूलों में अंग्रेजी लादने का विरोध कर रहे हैं वे समस्या का केवल एक पक्ष देख अथवा दिखा रहे हैं। क्या मात्र इन स्कूलों को अंग्रेजी से दूर रखना समस्या का समाधान हैं? वे यह क्यों नहीं जानना चाहते कि इन स्कूलों में छात्रों का प्रतिशत लगातार क्यों गिर रहा है? क्या इसका कारण इन स्कूलों में पढ़ाई के स्तर के साथ-साथ अंग्रेजी का न होना नहीं है? अधिसंख्यक लोगों के व्यवहार और वातावरण के साथ चलना आम आदमी की मजबूरी है। एक रिक्शा चालक, घर-घर जाकर बर्तन साफ करने वाली, सफाई करने वाले, कपड़े धोने वाले, सब्जी बेचने वाले का वास्ता हर क्षण ऐसे लोगों से पड़ता है जो ‘सड़सठ’ नहीं समझते। उनके लिए सिक्सी ऐट जानना जरूरी है। सच तो यह है कि वे ग्यारह, बारह क्या दो, तीन, चार भी नहीं जानते। उनके साथ संवाद, व्यवहार, व्यापार, लेन-देन करने के लिए उन्हें भी गलत या सही अंग्रेजी सीखने की आवश्कता महसूस होती है। जो स्वयं अंग्रेजी नहीं सीख सके वे अपने बच्चों को सिखाना चाहते हैं। अतः उनका सरकार पर दबाव है कि उन स्कूलों में भी अधिकांश स्कूलों की तरह अंग्रेजी होनी चाहिए। ऐसी मांग करने वालों की मजबूरी को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
यह कहना अपनी जगह सही हो सकता है कि नगर निगम के स्कूलों को निजी स्कूलों से मुक़ाबला करने के लिए अंग्रेज़ी का सहारा लेने की कोई जरूरत नहीं है। पढ़ाई का स्तर सुधार कर वे उन स्कूलों से बेहतर परिणाम दे सकते है। दरअसल इस तर्क में आवाज जरूर है। परंतु लड़खड़ाती हुई कमजोर आवाज। वास्तव में केवल शिक्षा में ही नहीं, जीवन के हर स्तर पर तुलना का दौर है। लगभग सभी सरकारी स्कूल निजी स्कूलों से तुलना करते हुए अपने छात्रों के गले में टाई तो बंधवा ही चुके हैं। वेशभूषा से परिवेश तक हर जगह तुलना की परिपाटी के बीच आप अंग्रेजी सीखने की मजबूरी को नजरअदाज कैसें कर सकते हैं?
अनेक विद्वान, शिक्षाविद इन स्कूलों में प्रथम कक्षा से अंग्रेजी लागू करने की कड़ी आलोचना कर रहे हैं। विश्व के अनेक देशों के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। लेकिन वे जरा अपने मन को टटोल कर उत्तर जानने की कोशिश करें कि क्या यहां शेष परिस्थितियां उन देशों जैसी है? अपनी शासन प्रणाली, संविधान, अपनेे नेताओं का आचरण, संसाधन, परिवेश, अपरिपक्वता तथा विभिन्न वर्गाे में बंटे समाज और सबसे बड़ी बात नैतिकता के बड़े -बड़े दावे करने वालों के खोखले चरित्र को बदले बिना इस भाषायी पाखंड को कैसे दूर किया जा सकता है?
यह भी विचारणीय है कि क्या मात्र इन स्कूलों में प्राथमिक स्तर पर अंग्रेजी रोकना पर्याप्त हैं? अगर अंग्रेजी को इस स्तर पर रोकना है तो देश के सभी स्कूलों में चाहे वे राजकीय हो अथवा निजी प्राथमिक शिक्षा का माध्यम केवल स्थानीय भाषा और छठी से स्थानीय भाषा के साथ हिंदी को किया जाना चाहिए। जिसे अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, स्विस, रसियन या अन्य विश्व की कोई भी भाषा सीखनी या सिखानी हो वह उसे एक विषय के रूप में ऐसा कऱ सकता है।
बहुत संभव है एक बहुत बड़ी लाबी जो अंग्रेजी को आधुनिक ज्ञान की ‘बैकबोन’ मानती है वे इस प्रस्ताव के विरोध में आसमान सिर पर उठा लें। उनके लिए अंग्रेजी के बिना विश्व से नाता टूट जायेगा। बेशक जर्मन, जापान, चीन, रसिया आदि अधिकांश देश अंग्रेजी के बिना आसमान छू सकते हो लेकिन भारत में अंग्रेजी नहीं रही तो प्रलय हो जायेगी। शिक्षा का माध्यम चुनने की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार बताने वाले अपनी करनी से बाज नहीं आयेगे तो क्यों न लोकतंत्र में बहुमत के बल पर भारतीय भाषाओं के पक्षधर सभी राजनैतिक दलों पर सरकारी नौकरियों केवल उन सरकारी स्कूलों में पढ़ने वालों के लिए आरक्षित करने का कानून बनाने का दबाव बनाये। यदि यह संवैधानिक प्रावधान कर दिया जाये तो अंग्रेजी की मजबूरी से काफी हद तक छुटकारा पाया जा सकता है।
हम इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि बेशक भाषा संवाद का माध्यम है लेकिन उसका रोजी -रोटी से भी संबंध होता है। जिस भाषा की जानकारी का रोजगार से कोई संबंध होगा, आप लाख चाहकर भी उसे आगे बढ़ने से नहीं रोक सकते। शायद राष्ट्रपति जी के मन में भी जरूर यह विचार रहा होगा कि अपनी भाषाओं का रक्षण जरूरी है। उन्होंने अपने जीवन में कठिनाईयों को बहुत करीब से देखा है अतः उनकी अभिव्यक्ति साधारण से साधारण भारतीय के प्रतिनिधि की आवाज है। वे अच्छी तरह से जानते हैं कि अगर अपनी भाषाओं की अनदेखी करते हुए विदेशी भाषा को तरजीह दी गई तो सामान्यजन के मन में विदेशी भाषा के प्रति आकर्षण का रोका नहीं जा सकता। निश्चित रूप से आरंभिक शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा नहीं होना चाहिए।

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