जनसँख्या का लोकतन्त्र


सुरेन्द्र पालीवाल

लोकतंत्र एक व्यवस्था या तन्त्र जिसमे लोगो का शासन लोगो के द्वारा स्थापित किया जाए। ये तो लोकतंत्र की एक संवेधानिक मात्र परिभाषा है। जबकि इसके विपरीत हम बात करे तो हम कह सकते है कि बहुसंख्यक समाज का ओर उनके अनुरूप शासन परंतु जब शासन व्यवस्था में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेने वाले ही देश के बहुसंख्यक समाज को अपने हितों के अनुरूप इतने टुकड़ो में बांट दे कि वो बहुसंख्यक देश के अल्पसंख्यक समाज से भी छोटा दिखने लगे। तथा इसी खेल के बीच मे जब सत्ता कि चाबी उस अल्पसंख्यक समाज को दे दे। इसी बीच उस अल्पसंख्यक समाज का विस्तार संख्या की दृष्टि से इतना बढ़ जाये कि वो एक दिन उस बहुसंख्यक समाज की ही ठेंगा दिखाए। क्योकि लोकतंत्र में सारा का सारा खेल मात्र ओर मात्र गिनती का होता है। इसके लिये आपको अपने दिमाग पर ज्यादा जोर देने की जरूरत नही है।
बस आप 2007 में प्रधानमंत्री कार्यालय से प्रकाशित सच्चर कमेटी के अंग्रेजी संस्करण की पृष्ठ संख्या 31 पर प्रकाशित सारिणी संख्या 3.1 पर प्रकाश डालेंगे तो आपको हो सकता है देश की आने वाली परिस्थिति अंधकारमय लगे। तो ऐसे में कौन ऐसी मशाल जगा कर वो बहुसंख्यक समाज की एकता को प्रकाशित करे ओर यदि कोई सामाजिक व सांस्कृतिक संगठन इस बात के लिए प्रयास करता भी है तो उसे साम्प्रदायिक करार दे दिया जाए। लुटियन से लेकर बर्किंघम के स्वामित्व वाले मीडिया घरानों अर्तगत बीबीसी के स्थानीय पत्रकार जब अपने व्यक्तिगत विचार को समाचार के रूप में जब लोगो के सामने रखते है। तो ऐसी स्थिति में समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग उन व्यक्तिगत विचारो ओर विश्लेषण को सार्वभौमिक सत्य मान कर अपने विचारों को भी उसी दिशा में गतिमान कर देते है। जिससे नुकसान ओर किसी का नही एक उस बहुसंख्यक समाज का होता है। जिस ने धर्मनिरपेक्षता की सदियों से अपने मन के अन्तःकरण में समाहित किया हुआ है ओर एक बहुत ही रोचक तथ्य ये है कि अगर जब कभी ये बहुसंख्यक समाज अर्थात हिन्दू समाज अपने मत का प्रयोग एक साथ एक दल के लिए अगर कर देता है। तो उसे मतों अर्थात मतों का धुर्वीकरण घोषित कर दिया जाता है और अगर हिन्दू वोट जातियों में बट कर जाता है। तो उसे साम्प्रदायिक सौहार्द के प्रतिमान के रुप मे स्थापित किया जाता है उदहारण स्वरूप 31 मई को जब उपचुनावों के रुझान आ रहे थें तो उसी बीच बीबीसी पर एक वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त का एक लेख प्रकाशित होता है। जिसमे बताया जाता है कि कैराना में जाट समुदाय का बीजेपी की जगह मुस्लिम समुदाय की प्रत्याशी को वोट देकर उसे विजयी बनाने से क्षेत्र में साम्प्रदायिक सौहार्द की स्थापना होगी। इससे क्या प्रतीत होता है कि एक वरिष्ठ पत्रकार की सोच और उसका चिंतन किस प्रकार का है। अब समय आ गया है कि समस्त बहुसंख्यक समाज को एक बार पुनः एकत्रित होकर एक ऐसे लोकतंत्र की स्थापना करनी होगी। जिससे एक ऐसे समाज की स्थापना हो सके जिसमे इस देश की सदियों पुरानी सनातन परंपरा के साथ सही मायने वाली धर्मनिरपेक्षता स्थापित रह सके न कि छद्मम धर्मनिरपेक्षता जो मात्र सत्ता लोलुप दलों व एक विचारधारा विशेष से ग्रषित पत्रकारों के द्वारा सृजित की गई हो अन्यथा हमे ये याद रखना होगा कि लोकतंत्र का अर्थ मात्र ओर मात्र लोगो का संख्या बल ही होता है। अर्थात जिसकी संख्या उसका राज ओर जिसका राज उसकी नीतियां ओर जिसकी नीतियां उसका शासन ……………..!

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