जंगल की जड़ें शहरों में पनपती हें पार्ट -1 ( नक्सल वाद )


डॉ. शोभा भारद्वाज

सत्तर के दशक में कालेज की दीवारों पर अनेक नारे छात्रों के लिए गढ़ कर लिखे गये थे। जैसे ‘सत्ता का जन्म बंदूक गोली से होता है’ किशोरावस्था से जवानी में पदार्पण करते आयु के जवान बहुत संवेदन शील तथा उनमें कुछ कर गुजरने की भावना होती है। छात्रों के बीच बहस होने लगी चीन और भारत में राजनीतिक परिवर्तन एक साथ हुआ लेकिन कम्यूनिस्ट चीन ने इतनी तरक्की की भारत इतना पीछे क्यों रह गया? 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर बड़े भूभाग पर कब्जा कर लिया हम कुछ नहीं कर सके। हमें सशस्त्र क्रांति की राह अपनानी है, हमारी क्रान्ति चीन जैसी सशस्त्र क्रान्ति बन कर परिवर्तन लाएगी। बहस को जन्म देने वाले छात्रों के बीच के ही छात्र थे बहस से जनमत बनाया जा रहा था। एक नया वाद, नक्‍सलवाद कम्यूनिस्टों के बीच में पनपने वाला आन्दोलन इसके असली जनक कानू सान्याल माने जाते हैं। कानू का जन्‍म दार्जिंलिग में हुआ था। वे पश्‍चिम बंगाल के सीएम विधानचंद्र राय को काला झंडा दिखाने के आरोप में जेल भी गए थे। वहाँ उनकी मुलाक़ात चारू मजूमदार से हुई जो माओं के परम भक्तों में से एक थे।

दोनों ने बाहर आ कर सरकार और व्‍यवस्‍था के खिलाफ सशस्‍त्र विद्रोह का रास्‍ता चुना। आज जिस नक्सलवाद से हम जूझ रहे हैं उसकी शुरूआत पश्चिमी बंगाल के गावँ नक्सलबाड़ी में सशस्त्र आन्दोलन द्वारा क्रान्ति की विचार धारा से हुई इसके जनक भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के चारू मजूमदार और कानू सन्याल थे। यह विचार धारा लोकतांत्रिक व्यवस्था के विरूद्ध है इनका मानना हैं भारत में मजदूरों और किसानों की बदहाली के लिए सरकारी नीतियाँ जिम्मेदार हैं क्योंकि सत्ता एवं प्रशासन पर उच्च वर्ग ने प्रजातांत्रिक व्यवस्था का लाभ उठा कर कब्जा जमा लिया हैं अत: एक सशस्त्र क्रान्ति के द्वारा ही न्याय विहीन व्यवस्था को बदल कर “वंचितों और शोषितों के अधिकारों की रक्षा होगी’ क्या वह नहीं जानते थे ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध गांधी जी के नेतृत्व में अहिंसा, सत्याग्रह और आत्म शक्ति के हथियार से सत्ता लेकर प्रजातांत्रिक व्यवस्था की स्थापना की थी?

कानू ने 1967 में नक्सलबाड़ी में सशस्त्र आंदोलन की अगुवाई की थी। नक्सलवादी विचारकों नें कम्यूनिस्ट क्रांतिकारियों की एक अखिल भारतीय समन्वय समिति बनाई और अपने आप को भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी से अलग कर सरकार के विरुद्ध अंदर ग्राउंड हो कर सशस्त्र क्रान्ति की शुरुआत की थी लेकिन कानू और चारू के बीच वैचारिक मतभेद बढ़ने लगे और दोनों ने अपनी अलग राहें चुन कर अलग पार्टियों के साथ संबंध जोड़े अब विचार धारा के समर्थक चुनाव जीत कर संसद में भी पहुंच गये हैं वह जानते हैं भारतीय जन मानस की समझ में गोली बंदूक खून खराबा भाषा नहीं आती। नक्सलवादी विचार धारा से न गरीब जिन्हें यह वंचित कहते हैं को लाभ हुआ न विचारधारा के समर्थकों को हाँ कई राज्यों में हिंसा से सैकड़ों निर्दोषों की जान अवश्य गयी। आंदोलनों ने मुख्यतया आदिवादी क्षेत्रों में प्रभाव बढ़ाया। नक्सलवाद के पनपने का कारण गरीबी और विकास का न होना माना जाता है जिससे यहाँ के निवासियों में असंतोष पनपता है जबकि यहाँ विकास की गति धीमी रहने का कारण नक्सलियों के हमले और खून खराबा हैं।

जंगलों में सीआरपीएफ पर आदिवासियों के औरतों बच्चों को आगे कर घात लगाते, छिप कर वार करते, सत्ता को चुनोती देते नक्सलियों के बारे में सभी जानते है लेकिन शहरों में बसे समाज का सुखी सम्पन्न सफेद पोश वर्ग देश में ही नहीं विदेशों तक में नक्सलियों के पक्ष में शोर मचा कर उनके लिए समर्थन जुटाते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता मानवाधिकार की दुहाई देते हुए खुल कर सामने आते हैं यही नहीं स्वयं पर फर्जी हमले करवाने से लेकर किसी पर भी बलात्कार के आरोप लगाने में निपुण हैं यदि सख्त पुलिस अफसर नक्सलाईट पर सख्ती बरतता हैं उसके पीछे पड़ जाते हैं कुछ चैनल टीआरपी बढ़ाने के लिए ऐसी खबरों को बार-बार चलाते हैं प्राईम टाईम में बहस कराते हैं लेकिन इनकी पुष्टि न होने पर मौन हो जाते हैं|सफेद पोश नक्सली गतिविधियों खून खराबे पर मौन धारण करने में निपुण हैं। यपीए की सरकार के गृहमंत्री पी चिंदबरम नक्सलियों के खिलाफ एयरफोर्स का इस्तेमाल करना चाहते थे उनका जम कर विरोध हुआ अत: अभियान पर ब्रेक लगाना पड़ा, मोदी जी ने भी सुकमा में हत्या कांड के तुरंत बाद सेना लगाने से परहेज किया।

जंगलों में सीआरपीएफ पर आदिवासियों के औरतों बच्चों को आगे कर घात लगा छिप कर वार करते हैं। सत्ता को चुनोती देते नक्सलियों के बारे में सभी जानते है लेकिन शहरों में बसे समाज का सुखी सम्पन्न सफेद पोश वर्ग देश में ही नहीं विदेशों तक में नक्सलियों के पक्ष में शोर मचा कर उनके लिए समर्थन जुटाते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता मानवाधिकार की दुहाई देते हुए खुल कर सामने आते हैं यही नहीं स्वयं पर फर्जी हमले करवाने से लेकर किसी पर भी बलात्कार के आरोप लगाने में निपुण हैं यदि सख्त पुलिस अफसर नक्सलाईट पर सख्ती बरतता हैं उसके पीछे पड़ जाते हैं।

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