क्या न्यायिक समीक्षा पाप या अपराध है?


डॉ. विनोद बब्बर

पिछले दिनों देश की सबसे बड़ी अदालत के कुछ फैसलों पर तीव्र प्रतिक्रिया देखी गई। अब तक अदालत के किसी भी निर्णय पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया का प्रचलन नहीं था इसलिए इसे एक नई परम्परा कहा जा सकता है। लेकिन प्रश्न है कि क्या अदालत के किसी निर्णय पर ईश्वरीय आदेश की तरह स्वीकार किया जाना चाहिए? इसका उत्तर शायद देश की सबसे बड़ी अदालत भी ‘हां’ में नहीं देगी क्योंकि जिला अदालत के निर्णय को गलत बताते हुए उच्च न्यायालयों और उच्च न्यायालयों के निर्णयों के विरूद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील का संवैधानिक प्रावधान है। अनेक बार उच्चतम न्यायालय की बैंच के सदस्यों को भी परस्पर विरोधी निष्कर्ष प्रस्तुत करते देखा गया है अतः कहा जा सकता है कि ‘किसी भी फैसले में ऐसे बाते होना संभव है जिनसे असहमति भी हो सकती है।’ बेशक कोर्ट के फैसले से मतभिन्नता अथवा नाराजगी का प्रदर्शन भारत के लिए यह नई परम्परा है लेकिन विश्व के अनेक देशों में अदालत के फैसले से असहमति / आलोचना का प्रचलन है।
जहां तक असहमति के ताजा विवाद दिवाली पर पटाखों पर प्रतिबंध तथा रोहिंग्या शरणाथियों के मामले पर दिये गये निर्णय है। जहां तक पटाखों पर पाबंदी का प्रश्न है, इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि अनेक ऐसे पटाखे हैं जो बहुत ज्यादा प्रदूषण फैलाते हैं। इसी कारण गत वर्ष प्रदूषण का सुरक्षा स्तर सामान्य से सात गुना से भी अधिक दर्ज किया गया था।
यह भी सत्य है कि पटाखों के निर्माण में इस्तेमाल किये गये बारूद, चारकोल, सल्फर आदि वायुमंडल में मिलकर प्रदूषण बढ़ाते हैं जो श्वांस नलिका के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश कर जहां अस्थमा, फेफड़ों के रोग, सांस संबंधी, हार्ट, आंख, छाती के रोगों को बढ़ाते हैंै। अतः प्रदूषण को नियंत्रित करना ही चाहिए। लेकिन दिल्ली में पटाखों की बिक्री पर एक नवम्बर तक प्रतिबंध का आदेश देने से मात्र कुछ ही दिन पूर्व इसी अदालत ने पहले से जारी प्रतिबंधों को हटाते हुए पटाखों की बिक्रकी के लाइसेंस जारी करने का आदेश दिया था। यहां यह प्रश्न पूछना पाप या अपराध नहीं होना चाहिए कि यदि यही करना था तो एक पखवाड़े पूर्व दिये गये आदेश का क्या औचित्य था? इसे कैसे गलत कहा जा सकता है कि पूर्व के आदेश के बाद जारी लाइसेंस प्राप्त कर्ताओं ने जो पटाखे खरीदे या खरीदने के आर्डर दिये ताजा आदेश के बाद उन्हें हुए आर्थिक नुकसान का जिम्मेवार किसे माना जाये?
यदि पटाखों पर प्रतिबंध ही लगाया जाना था तो सुविचारित होना चाहिए था। दूसरा प्रतिबंध मात्र एक नवम्बर तक ही क्यों? उसके बाद क्यों नहीं? क्या क्रिसमस, नववर्ष या अन्य अवसरों पर बिक्री पर प्रतिबंध नहीं रहेगा? यदि हां तो बेशक उस अवसर पर कम पटाखे इस्तेमाल होते हैं परंतु जितने भी होते हैं वे प्रदूषण फैलाते ही हैं? तीसरा प्रश्न यह भी है कि इसे पूर्व भी यदि प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों के इंजन और ईंधन को बदलकर कम प्रदूषण वाले वाहनों को चलाने की अनुमति दी गई तो कम प्रदूषण वाले पटाखों की सूची जारी की जा सकती थी।
रोहिंग्या शरणाथियों को शरण देने के मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा मानवीय आधार पर गैरकानूनी रूप से भारत में घुसे लोगों का पक्ष लेना अनेक प्रश्न उत्पन्न करता है क्योंकि सरकार का दावा है कि इन रोहिंग्या शरणाथियों को भारत में रहने की अनुमति देने से सुरक्षा संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो सकती है। यदि सुरक्षा संबंधी कोई चूक या दुर्घटना होती है तो कार्यपालिका को जिम्मेवार ठहराया जाता है तो उसकी राय की अनदेखी करते हुए मामले को लटकाने पर प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं। यहां विशेष रूप से स्मरणीय है कि उच्चतम न्यायालय को जिस संविधान का संरक्षक कहा जाता है उसी संविधान ने कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका के कर्तव्यों और अधिकारों को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है। इस बात पर स्वयं सरकार को अदालत को विचार करना चाहिए कि क्या रोहिंग्या मामले में माननीय अदालत का आदेश इस प्रावधान की मूल भावना के साथ कितना न्याय करता है।
आज सामान्यजन के मन में भी यह प्रश्न उठ रहा है कि माननीय न्यायालय को गलियों, सड़को, नालियों की गंदगी, प्रदूषण तो दिखाई देता है लेकिन क्या कारण है कि देश की अदालतों में व्याप्त भ्रष्टाचार, अव्यवस्था, विलम्ब दिखाई नहीं देता? दशकों से लम्बित मामलों के निपटान पर सवाल उठने पर कहा जाता है कि ‘न्यायाधीशों की कमी है’। निश्चित रूप से यह तर्क सही है लेकिन न्याय प्रदान करने के मूल कार्य के बदले इन मामलों की सुनवाई में करने के लिए आखिर माननीय समय कैसे व्यवस्थित कर लेते हैं? दशको से अदालतों में न्याय की इन्तजार में धक्के खा रहे निर्दाेष लोगो को राहत देने के मुद्दे पर हमारा मौन खलना चाहिए। अनेक मामले तो देश के लिए नासूर बने हुए है न्याय का सर्वभौमिक सिद्धांत है, ‘बेशक हजार दोषी छूट जाए लेकिन किसी निदोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए। देश की सबसे बड़ी अदालत के बाद क्या कानूनी रूप से वैध लाइसेंस प्राप्त कर सामान खरीदने वालों को दोषी माना जा सकता है? जो देश अपने सभी नागरिकों को सुविधाएं और अधिकार नहीं दे सका वहां अराजक और हिंसक होने के कारण अपना देश छोड़ने को विवश लोगों को सुविधाएं प्रदान करना आखिर किस तरह जायज है? क्या इस देश के संसाधनों पर प्रथम अधिकार इस देश के पुत्रों का नहीं होना चाहिए? मानवता बहुत बड़ी बात है लेकिन अपने बच्चों का गला घोंट कर मानवता को शायद ही दुनिया की कोई अदालत उचित कहें।
न्याय में देरी का मुद्दा महत्वपूर्ण है। ऐसे लोगों की कमी नहीं जिनका पूरा जीवन ही न्याय के इंतजार में बीत गया। कहा गया है ‘जस्टिस डिलेड इज, जस्टिस डिनाइड’ अर्थात् ‘न्याय में देरी, न्याय से वंचित होना ही है’ क्या यह सत्य नहीं कि आज न्यायालयों में न्याय के नाम पर ‘तारीख पर तारीख’ ही तो मिलती है। एकाधिक स्वयं देश की सबसे बड़ी अदालत भी इस स्थिति पर अपना पीड़ा और चिंता जता चुकी है। एक अध्ययन के अनुसार भारत में न्याय मिलने में काफी वक्त लगता है और यह प्रक्रिया काफी खर्चीली है। एक दीवानी मामले के निपटारे पर औसतन 15 वर्ष, तो आपराधिक मामले में पांच से सात वर्ष तक का वक्त लगता है। कई मामलों में यह अवधि अधिक भी हो सकती है।
माना कि कुछ मामलों में अपरिहार्य कारणों से देरी हो सकती हैं लेकिन अधिकांश मामलों में देरी अनावश्यक है जैसे झारखण्ड में निचली अदालतों में चल रहे कुल तीन लाख मामलों में से एक चैथाई अर्थात् 75 हजार मामलों में पुलिस रिपोर्ट न सौंपने के कारण कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पा रही। क्या माननीय न्यायालय को समयबद्ध तरीके से अपना कर्तव्य पालन न करने वाले कुछ अधिकारियों को दंडित किया? माननीय न्यायालय मुकदमो को अनावश्क ढ़ंग से लटकाने के विरूद्ध नियम बनाये तो उसका सर्वत्र स्वागत किया जायेगा।
अदालती विलंब का एक कारण कई मुद््दों पर संशय भी होता है। ऐसे में यह लगता है कि मानो कानून अस्पष्ट है। अनेक बार उच्च न्यायालय के सामने भी ऐसी अनिश्चितता की स्थिति रहती है तो एक ही अथवा एक जैसे मामलो में अलग-अलग फैसले आते हैं। किसे याद न होगा कि बहुचर्चित हवाला मामले में कहा गया कि ‘डायरी को सबूत माना जा सकता है।’ इ आधार पर देश के अनेक प्रमुख नेताओं पर मामले दर्ज हुए लेकिन बाद में कहा गया कि ‘ल्ूज पेजेज आर नाॅट इविडेन्स।’ एक नेता को टाडा अदालत ने कठोर सजा दी तो उच्च न्यायालय ने न केवल उस सजा को रद्द किया बल्कि सजा सुनाने वाले जज के विरूद्ध कठोर टिप्पणी करते ‘उन्हें कानून की प्राइमरी जानकरी भी न होने’ की बात कहते हुए उनका पद अवमूल्न किया। बाद में वही जज उच्च न्यायालय तक भी पहुंचे। जहां उनके दिये निर्णयों को नजीर माना जाता है। जेसिका लाल हत्याकांड में पैंतीस गवाह मुकर गए तो अभियुक्त बरी हो गए। तो न्यायमूर्ति ने निर्णय को पलटते हुए न केवल जिला जज पर कठोर टिप्पणी भी की बल्कि मुकरने वाले गवाहों के खिलाफ मुकदमे का आदेश दिया था जिसपर आज तक निर्णय नहीं आया।
यहां यह विशेष रूप से स्मरणीय है कि न्यायालय को अच्छे निर्णय के लिए प्रशंसा मिलती है तो उसके ताजा फैसलों पर सवाल उठाने का उद्देश्य न्यायालय की अवमानना अथवा उसका निरादर नहीं है। न्यायिक समीक्षा का प्रावधान प्रमाण है कि ऐसा करना विधि सम्मत है।

No Comments