कौन जीता ?


रमेश मनोहरा

“अरे शर्मा जी” फ़ाइल से नजर हटा कर जब अनुराग शर्मा ने गर्दन उठाकर मनोहर त्रिवेदी की तरफ देखकर कहाँ हाँ त्रिवेदी जी बोलो?
“दरवाजे के पास जो कन्जूमर आ रहा है”, उसकी और इंगित करते हुए मनोहर त्रिवेदी बोले -मेरा पूछे तो कह देना, आज छुट्टी पर है।
“हाँ कह दूंगा मगर आप छिपाना क्यों चाहते है?
“अरे बड़ा कंजूस है फ्री में फ़ाइल निपटाना चाहता है” कहकर मनोहर त्रिवेदी पीछे जाकर छिप गये कुछ क्षण बाद ही अधेड़ सा आदमी मनोहर त्रिवेदी की टेबिल के सामने आकर खड़ा हो गया।बाबू को न पाकर वह इधर-उधर देखने लगा, तब अनुराग शर्मा बोले- क्या काम है? “ई बाबूजी कहाँ गये?” खाली टेबल की इंगित करते हुए उसने कहा।
“त्रिवेदी जी, आज छुट्टी पर है” कहकर अनुराग शर्मा फिर फ़ाइल में खो गये, वह आदमी बोला गजब हो गया, अभी तो मैंने टेबिल पर बैठे हुए देखा था।
“तो मैं झूठ बोल रहा हूँ” जरा नाराजगी से अनुराग शर्मा बोले-
“नहीं साब?” तो फिर विश्वास क्यों नहीं करते?” अनुराग शर्मा फिर उसी अंदाज में बोले- तुमने त्रिवेदी जी को यहाँ बैठे देखा तो क्या उन्हें जमीन खा गई, निश्चित तुम्हे दृष्टि भ्रम हुआ होगा।
“हाँ हो सकता है, वह आदमी भी समर्थन करते हुए बोला-कुछ क्षण तक खड़ा-खड़ा विचार करता रहा।तब अनुराग शर्मा बोले-अब खड़े क्यों हो? अब भी तुम्हें यकीन नहीं हो रहा है कि मैं झूठ बोल रहा हूँ जाओ कल आना।
वह आदमी जाने लगा, तब अनुराग शर्मा बोले-रुकों, वह आदमी वही रुक गया, बाबू अनुराग शर्मा धीरे से बोले-क्या काम था? “मेरी फ़ाइल तीन महीने से अटका राखी है” उसने उत्तर दिया।
“क्यों अटका रखी है?”
मुझे नहीं मालूम बाबूजी”
“कभी मालूम करने की कोशिश की” अनुराग शर्मा ने कलम रोक कर पूछा।
“जब भी आता, अभी फ़ाइल नहीं निपति कहकर बहाना बना दिया करते है,आप इन बाबू से कहकर फाइल निपटा दो” हाथ जोड़कर वह आदमी बोला, तब अनुराग शर्मा बोले- मैं करावा दूंगा मगर इसके लिए त्रिवेदी जी को पटाना पड़ेगा।
“यह किस चिड़ियाँ का नाम है?” उस आदमी ने पूछा।
“यह दफ्तरों की कोड भाषा है”
ठीक है मैं समझ गया
जब समझ गए तब कल आना, त्रिवेदी जी को पटा लेना फिर मैं भी तुम्हारी फ़ाइल निपटाने में सहयोग करूँगा।
वह आदमी गर्दन हिलाकर अपनी स्वीकृति देकर चला गया।कुछ देर बाद मनोहर त्रिवेदी आकर बोले-गया वो?
“हाँ गया” अनुराग शर्मा ने बिना गर्दन उठाये कहा
“क्या कह रहा था? उत्सुकता से मनोहर त्रिवेदी ने पूछा
“कह रहा था , बाबूजी चक्कर पर चक्कर कटा रहे है, जान बूझ कर फाइल नही निपटा रहे है”
“साला कंजूस में फ्री फ़ाइल निपटाना चाहता है” नाराज होते हुए मनोहर त्रिवेदी बोले-
“मगर मैंने उसको चाबी भर दी है”
“चाबी से मतलब” “मतलब यह कि बाबूजी को पटाओं”
“सच ऐसा कहा, दिर वो क्या बोला? मनोहर त्रिवेदी प्रसन्न होकर बोले-
“बोला कि पटा लूँगा”
“ऐसा बोला” उत्सुकता से मनोहर त्रिवेदी बोले-
“तो मैं क्या झूठ कह रहा हूँ।देखना वो कल आएगा और तुम्हारी जेब में चुपचाप धर देगा” कहकर अनुराग शर्मा ने अपनी बात पूरी की, तब आगे अनुराग शर्मा बोले-देखो त्रिवेदी जी, अकेले-अकेले मत डकार जाना?
“क्या मतलब आपका?”
“मेरा मतलब यह है कि जो तुम्हें मिले उसका आधा हिस्सा मेरा होगा”
“वाह! शर्मा जी आपका क्यों? फ़ाइल पर मेहनत मैं करूँगा” नाराज होते हुए मनोहर त्रिवेदी बोले-
और आधा हिस्सा आप मुफ्त का मांग रहे है।
“अरे आधे का मेरा हक बन रहा है, क्योंकि तुम्हारे कन्जूमर को मैंने पटाया”
“आप मेरे कन्जूमर को पटाते कहाँ हो! बल्कि देखकर भगा देते हो” उल्टा आरोप लगाते हुए अनु त्रिवेदी ने कहा।
अनुराग शर्मा बोले-
“आप मुझ पर आरोप लगा रहे हो!” गुस्से से उबल पड़े अनुराग शर्मा और त्रिवेदी में थोड़ी देर तक आरोप-प्रत्यारोप चलते रहे।जब आरोप-प्रत्यारोप से बात न बनी तो एक दूसरे को गाली देने लगे और उनका झगड़ा चरम बिन्दु पर पहुँच गया।तब स्टाफ के हेड कलर्क मनीष दुबे बीच बचाव करते हुए बोले-क्यों कसाइयों की तरह लड़ रहे हो?
“देखो सर, कसाई बन कर शर्मा जी लड़ रहे है।मेरे अधिकार की फाइल मैं निपटाऊंगा मगर ये आधा हिस्सा मांग रहे है, भला मैं क्यों दूँ? नाराज होते हुए त्रिवेदी ने अपना पक्ष रखा।
“देखो तुम लोगों ने दफ्तर कसाईखाना बना रखा है जरा-जरा सी बात पर ऐसे लड़ते हो जैसे कसाई लड़ते है” समझाते हुए मनीष दुबे बोले- तुम लोग कब समझोगे?
“देखो सर ” अपना पक्ष रखते हुए अनुराग शर्मा बोले- इनके खुद के कन्जूमर मैं पटाकर इनकी इनकम करवाता हूँ तो मेरा हिस्सा हुआ कि नहीं?
“क्यों झूठ बोलते हो शर्मा जी” मनोहर त्रिवेदी नाराज होकर बोले-आज तकमेरे कन्जूमर को पटाया है जो अधिकार जाता रहे हो?” मैं उस कन्जूमर की मिली रकम से एक फूटी कोड़ी भी नहीं दूंगा।
“अरे क्यों नही दोगे तुमने अपने घर का राज समझ रखा है? जो नहीं डोज मैं लड़कर लूँगा।” अनुराग गुस्से से बोला।
“मैं पहले ही कह चूका हूँ कि एक फूटी कौड़ी भी नहीं दूंगा”।उसी गुस्से से मनोहर बोले।
“अरे कैसे नहीं दोगे?” मैं जबरदस्ती छीन कर लूँगा।
“ताकत हो तो छिनकर बताना”
“अब चुप भी हो जाओ”।डांटते हुए मनीष बोले- अभी उस कन्जूमर की फाइल निपटी भी नहीं, उसी के लिए झगड़ा पहले करने लगे हो।अब कोई किसी के खिलाफ नहीं बोलेगा।
“देखो सर……” अभी मोहर त्रिवेदी ने मुंह खोला ही था मनीष जी ने डांटते हुए बोले- चुप रहो त्रिवेदी जी, वरना मुझे एक्शन लेना पड़ेगा।
फिर आगे कोई कुछ नहीं बोला।दोनों चुप हो गये।मनीष जी अंतिम बार समझाकर अपने केबिन में चले गये मगर अनुराग और मनोहर एक दूसरे को काफी der तक जली जली नजरों से देखते रहे।फिर कही जाकर अपनी अपनी फ़ाइलों में खो गए।
अगले दिन वही कन्जूमर त्रिवेदी की टेबिल के सामने खड़ा होकर बोला- बाबूजी कल अच्छा धोखा दिया।पीछे जाकर छिप गये और कहलवा दिया छूट्टी पर हैं।
मनोहर रिवेदी कोई जबाब नहीं दे पाए।आगे कन्जूमर बोला-अब क्या विचार है, आप मेरी फ़ाइल के लिए कौन सा बहाना करोगे? मगर मैं कभी आपको पटाउँगा भी नहीं, आज तो आप मेरी फाइल आगे रहकर निपटाओगे।
“बड़े विश्वास से कह रहे हो? त्रिवेदी ने जलन भरी निगाह से उसे देखते हुए कहा।
“अभी पता चल जाएगा।’
“मुझे धमकी दे रहे हो?”
“धमकी नहीं समझा रहा हूँ, आप मेरी फाइल को लेकर बैठ जाइए!”
“अच्छा तो मुझे आदेश दे रहा है”।नाराज होते हुए मनोहर त्रिवेदी बोला।
“मैं आदेश देने वाला कौन होता हूँ?”
“बात तो तू ऐसी ही कर रहा है।जा आज भी मैं तेरी फाइल नहीं निपटाऊंगा!” त्रिवेदी का गुस्सा इस समय सातवें आसमान पर था।जिस फ़ाइल को वे निपटा रहे थे, उस फाइल की अच्छी खासी रकम उनको मिल चुकी थी।और यह कन्जूमर व्यर्थ में आकर उनके कार्य में व्यवधान डाल रहा था।अत: थोडा नम्र पड़ते हुए त्रिवेदी बोला-ठीक है तेरी फाइल भी निपटा दूंगा, थोड़ी देर बैठ।
“नहीं बाबूजी बैठने के लिए नहीं आया हूँ, काम कराने के लिए आया हूँ।इस बीच चपरासी ने आकर कहा-त्रिवेदी जी साहब बुला रहे हैं!”
साहब को क्या काम आ पड़ा? झल्ला पड़ा त्रिवेदी।
“अब मुझे क्या मालूम मैं ठहरा चपरासी साहब का गुलाम।
“कह देना अभी थोड़ी देर में आ रहा हूँ!
“अरे नहीं, मझे कहा है, तत्काल लेकर आओ।नहीं तो बड़े साब नाराज हो जायेंगे।त्रिवेदी तत्काल उठ गया और चपरासी के पीछे-पीछे चल दिया।कन्जूमर भी तुरंत उनके पीछे लपकने लगा, तब अनुराग शर्मा उसे देखकर बोले- ऐ इधर आ।वो आदमी उनकी टेबिल के पास आ गया।अनुराग ने धीरे से पूछा उस बाबू को पटाया क्या?
“मैं भला क्यों पटाउँगा?” देखना आज झक मरकर फाइल निपटायेगा।
“देख अब फाइल के लिए पटाना भी मत”।
“क्यों बाबूजी कल तो आपने पटाने की बात कही थी, आज उल्टा क्यों कह रहे हो?
अरे यह तो बदतमीज है, इसकी शिकयत करना”
“बाबूजी आप कहाँ दूध के धुले हो? वो व्यंगात्मक लहजे में जब उस आदमी ने कहा तब अनुराग खामोश हो गया।तब वह आदमी आगे फिर बोला-मगर मैं आप सब को जानता हूँ आप दोनों एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हो।दोनों इस दफ्तर के बुगला भगत हो।वे बाबूजी आप से ज्यादा कमा रहे है।इसलिए आप उनसे जलन रख रहे है।देखना ई बाबूजी मेरा काम चुटकियों में करेंगे!
जब खरी-खरी बात उस आदमी ने कही अनुराग चुप हो गये।उस आदमी से आगे कुछ न बोले चुपचाप फाइल में खो गये।
तभी मनोहर त्रिवेदी टेबिल पर झन्नाकर बैठ गया तब कन्जूमर बोला क्यों साहब नाराज लग रहे हो।मनोहर ने कोई जबाब नहीं दिया।टेबिल पर पड़ी जो फाइल निपटा रहे थे।उसे बंद कर अलमारी में रख दी और कन्जूमर की फाइल निकालकर देखने लगे।वह बोला-लगता है साहब ने आपको डांट दिया है।
“क्यों जले पर नामक छिडक रहे हो? तुम्हारी वजह से साहब ने मुझे दांता है।”
“मेरी फ़ाइल पहले ही निपटा देते तो साहब की डांट सुनने को नहीं मिलती” व्यंग से मुस्कराते हुए बोला।
“ऐसी तगड़ी सिफारिश लेकर आये थे” मनोहर त्रिवेदी ने जब यह पूछा और आगे बोला क्योंकि साहब ने सबसे पहले तुम्हारी फ़ाइल न९प्ताने को कहा है।तब वो आदमी मुस्करा कर बोला- आप जैसे बाबूओं के लिए इलाज करना भी जरुरी था।अब तो मेरी फाइल निपटा दोगे आज?
“अरे मेरे बाप, तेरी ही फाइल निपटा रहा हूँ, तु बहुत पहुँच वाला आदमी है न इसलिए निपटाना पड़ेगा।” अपनी हार स्वीकार करते हुए मनोहर त्रिवेदी बोला।
“बाबूजी आप मेरी फाइल दबाब में आकर जरुर निपटा रहे है।जैसे आपके पास पटाने का तरीका होता है।वैसा ही मेरे पास पटाने का तरीका था अब बताओ कौन जीता ?
“हाँ भाई तु जीता मैं हरा, अब बैठ जा, मैं एक घंटे में तेरी फ़ाइल निपटाता हूँ।बाबु मनोहर त्रिवेदी ने जब यह कहा तो कन्जूमर मुस्कराते हुए सामने वाली कुर्सी पर जाकर बैठ गया और अंतर्मन में विचार करने लगा आखिर जीता कौन त्रिवेदी ? मैं ? या सिस्टम ?

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