कर निर्धारण


अजित तिवारी

kautilyaकर निर्धारण सदा से ही शासन तंत्र के लिए बहुत जटिल विषय रहा है। इसका प्रमुख कारण है की एक ओर कर देश की राजस्व प्राप्ति का प्रमुख संसाधन है, जिसपर देश में चलने वाले सामाजिक कल्याण और आर्थिक कल्याण के लिए चलने वाले योजनाओं का भविष्य निर्भर करता है, तो दूसरी ओर अगर समाज के आर्थिक विषमताओं और जनसामान्य और व्यापारियों तथा उद्योगों के करधारण की क्षमता का सही आकलन किये बिना कर निर्धारण करने से कर चोरी की प्रवृति बढती है तथा कालेधन की वृद्धि होती है ।कर चोरी के कई दूरगामी दुष्परिणाम होते है, एक तो कर की चोरी की प्रवृति बढ़ने से देश के कुल राजस्व संग्रहण में कमी आती है, जिससे सामाजिक कल्याण और आर्थिक विकास के कार्यक्रम बाधित होते हैं और दूसरा कालेधन के रूप में देश की संसाधनों का दोहन करके प्राप्त किया हुआ धन अधिकतर विदेशों में चला जाता है। इस प्रकार कालेधन की वृद्धि के कारण अपने देश का विकाश बाधित होता है और दुसरे देश की अर्थव्यवस्था को उससे लाभ पहुचता है ।वर्तमान समय में भारत में कर चोरी और काला धन दोनों ही बहुत बड़ी समस्या है ।इस प्रकार कर निर्धारण एक बहुत ही संवेदनशील विषय है ।जिसका विवेकपूर्ण तथा व्यवहारिक निर्धारण देश को प्रगति के मार्ग पर अग्रसरित करता है तो अव्यवहारिक रूप से कर वृद्धि देश की प्रगति के मार्ग को बाधित करता है।
कर प्रबंधन की जटिलता और संवेदनशीलता को देखते हुए प्राचीन भारतीय अर्थचिंतकों ने समाज के मनोविज्ञान तथा अर्थ वृद्धि के मूल को समझते हुए व्यवहारिक, कालनिरपेक्ष, संवहनीय तथा मानवीय मूल्यों पर आधारित कर-प्रणाली की अवधारणा प्रस्तुत किया था।
कर के सन्दर्भ में मनु ने बहुत ही व्यवहारिक और संतुलित व्यवस्था प्रदान किया था ।मनु के अनुसार शासक को योग्य तथा विश्वासी व्यक्तियों के द्वारा वार्षिक कर एकत्र कराना चाहिए जो कर लेने में प्रजा के साथ न्य्याय का व्यवहार करें और शासक स्वयं प्रजा से पिता के समान व्यवहार करे। मनु ने कर को राष्ट्र की आय का प्रमुख साधन बताया है, साथ ही साथ कर संग्रह में अल्प कर की अवधारणा पर बल दिया है ।मनु के अनुसार –mughal-land-revenue-system
“जिस प्रकार जोंक थोडा-थोडा खून पिता है, बछड़ा दूध पिता है तथा भौंरा शहद एकत्र करता है शासक को भी उसी प्रकार राष्ट्र से वार्षिक कर एकत्र करना चाहिए |”
व्यापारियों से कर लेने के सन्दर्भ में भी मनु ने जो अवधारणा पर्स्तुत किया था वह हर काल के लिए प्रासंगिक और कर निर्धारण में मार्गदर्शक है ।मनु ने इस सन्दर्भ में कहा है की तीन बिन्दुओं का ध्यान करके शासक को व्यापारियों पर कर निर्धारण करना चाहिए। 1- प्रजा की क्रय शक्ति को देखते हुए, 2- शासन के कोष का विचार करते हुए और 3- व्यापारीवर्ग के लाभांश का ध्यान रखते हुए ।अधिक कर लगाने व्यापारी वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि कर देंगे जिससे जनसामान्य को वस्तुएं महंगे मूल्य में मिलेंगी ।यदि अत्यंत न्यून कर लिया जाएगा तो कोष प्रभावित होगा और यदि व्यापरी को पर्याप्त लाभ नही होगा तो उससे व्यापार में हानि होगी तथा अंततः कोष में भी हानि होगी ।मनु के अनुसार क्रय-विक्रय, मार्ग-व्यय, भोजन पर होने वाले व्यय को, मार्ग रक्षा का व्यय और सम्यक प्रकार के हानि-लाभ को ध्यान में रखकर ही व्यापारियों पर कर लगाना चाहिए।
मनु के बाद के भी सभी आर्थिक चिंतकों जैसे आचार्य शुक्र, आचार्य भीष्म, आचार्य कौटिल्य, कामंदकी आदि सभी विद्वानों ने कर निर्धारण की इसी प्रकृति का अपने-अपने कालखंड में समर्थन किया है ।मनु से लेकर कौटिल्य, कामंदकी तक का एक बहुत विशाल कालखंड है, हर कालखंड में अर्थ उत्पादन के स्रोत और उपभोग के स्वरुप के साथ कर निर्धारण की मूल प्रकृति यही रही है ।भारत में अर्थ चिंतन की दीर्घ और सुदृढ़ परंपरा रही है, और जैसा की स्पष्ट है की कर राष्ट्र की आय के प्रमुख साधन होते हैं और इस प्रकार राष्ट्र के आर्थिक विकास में इनकी बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका होती है, भारत कर निर्धारण की इसी अवधारणा के साथ शताब्दियों विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था तथा विश्व का सबसे समृद्ध राष्ट्र रहा है।

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