और हम डरे-डरे, नीर नयन में भरे!!!


डॉ विनोद बब्बर

और हम डरे-डरे, नीर नयन में भरे!!!
पद्मभूषण गोपाल दास ‘नीरज’ के गीतों से परिचय बहुत पुराना है लेकिन उन्हें प्रत्यक्ष सुनने का अवसर आपातकाल के बाद (1977 या 78) में एक कार्यक्रम में मिला। उसके बाद तो लालकिले का कवि सम्मेलन हो या अन्यत्र, सब काम छोड़कर उन्हें सुनने पहुंच जाते। लेकिन पहली बार बातचीत का अवसर 80 में मिला। शाम को कार्यक्रम था, नीरज जी जहां रूके थे, हम वहां पहुंच गये। खुशदिल नीरज जी से खूब बाते हुई। उन्होंने भी मुझसे मेरे बारे में, मेरे परिवार के बारे में पूछा। एक मित्र साथ थे। इससे पहले कि मैं उत्तर देता, मित्रवर ने नीरज के प्रसिद्ध गीत ‘अब के सावन इक शरारत मेरे साथ हुई’ की परौडी प्रस्तुत करते हुए कहा,, ‘इस जन्म में इक शरारत इसके साथ हुई, इसे छोड़ सारे शहर की बारात हुई।’ तो नीरज जी ने मुस्कुराते हुए पूछा, ‘संघी या आर्यसमाजी हो?’ खैर हमने उनसे यही सुनने की फरमाइश की तो उन्होंने जब तरन्नुम में इसे प्रस्तुत किया तो हम भावविभोर हो गये। इसका एक-एक शब्द बहुत कुछ कहता है। देखे-
अब के सावन में ये शरारत मेरे साथ हुई,
मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई।

आप मत पूछिए क्या हम पे सफ़र में गुजरी?
था लुटेरों का जहाँ गाँव वहीं रात हुई।

ज़िंदगी-भर तो हुई गुफ़्तगू गैरों से मगर,
आज तक हमसे न हमारी मुलाक़ात हुई।

हर गलत मोड़ पे टोका है किसी ने मुझको,
एक आवाज़ जब से तेरी मेरे साथ हुई।

मैंने सोचा कि मेरे देश की हालत क्या है,
एक कातिल से तभी मेरी मुलाक़ात हुई।
यह दुखद आश्चर्य ही है कि अभी कल ही (19 जुलाई) को किसी ने पूछा- आपके यहां बारिश कैसी है तो अनायास मुंह से निकला- ‘मेरी बस्ती छोड़ सारे शहर में बरसात हुई’ लेकिन अंधेरा होते-होते भारतीय साहित्य के आकाश के इस सर्वाधिक चमकदार नक्षत्र के अस्त होने के समाचार ने विचलित कर दिया। उनके संस्मरण स्मृति पटल पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगे।
नीरज जी अपने वादे के पक्के थे। अभी कुछ वर्ष पूर्व की बात है, एक मित्र ने अपने पुत्र की प्रथमम पुस्तक के लोकार्पण समारोह के आयोजन का दायित्व हमे सौंपा। अनेक विभूति के अतिरिक्त नीरज जी को भी आना था। दिन में जानकारी मिली कि नीरज जी कुछ अस्वस्थ हैं। इसलिए आशंका थी कि शायद उनके दर्शन का सौभाग्य न मिले। लेकिन आश्चय्र कि वे समय से एक घंटा पूर्व ही कार्यक्रम स्थल पर उपस्थित थे। लूंगी में पेशाब की थैली साफ दिखाई दे रही थी। शायद सीधे अस्पताल से आये थे। अतिथियों के आगमन से पूर्व खूब बाते हुई। ‘राष्ट्र-किंकर लगातार मिलता है’। खूब लिखते हो। लगे रहो भाई!’ कहकर उत्साह बढ़ाया। कार्यक्रम में ज्यादा देर नहीं रुके, परंतु श्रोताओं की मांग पर कुछ गीत प्रस्तुत जरूर किये। आवाज की खनक कहां संकेत देती थी कि गीतों का यह जादूगर थक रहा है। कार्यक्रम का संचालन मेरे पास था, मैं याद कर रहा था नीरज जी का गीत-‘जैसे राधा ने माला जपी श्याम की मैं ने ओढ़ी चुनरिया तेरे नाम की तेरे नाम की हो पिया, तेरे ही नाम की!’
जहां तक फिल्मी गीतो का सवाल है, अनेक फिल्में केवल इसलिए देखी गई कि उसमें नीरज जी के हिट थे।
-ए भाई, ज़रा देख के चलो आगे ही नहीं, पीछे भी दायें ही नहीं, बायें भी ऊपर ही नहीं, नीचे भी तू जहाँ आया है वो तेरा घर नहीं, गली नहीं, गाँव नहीं कूँचा नही
-स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!
– दिल आज शायर है, ग़म आज नगमा है।
-देखती ही रहो आज दरपन न तुम, प्यार का ये मुहूरत निकल जाएगा।
-चूड़ी नहीं ये मेरा दिल है, देखो देखो टूटे ना।
-आज मदहोश हुआ जाए रे मेरा मन!
-शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब!
कहां तक गिनवाये, नीरज जी बेहतरीन गीतों का अनन्त खजाना संसार को सौंप कर गये हैं। उनके गीतों में केवल प्यार और श्रृंगार ही नहीं दर्द, तड़प, अहसास,भावनाएं, बेचौनी से मनुहार तक जीवन का हर रंग, हर रस है। उस मस्त मौला की दार्शनिकता बेजोड़ थी। क्योंकि गीत उस शब्दसाधक के लिए पूजा थी इसलिए प्रसाद के रूप में संसार को सदैव श्रेष्ठ ही मिला। इससे शायद ही कोई असहमत हो कि नीरज जी अद्वितीय थे। उनके जैसा गीतकार मिलना मुश्किल है।
कहने को बहुत कुछ हैं। चार दशकों के परिचय में अनेक बार मिले। हर बार कुछ नया मिला। लेकिन शतक पूरा करने का वादा अधूरा छोड़ गये। पर जितना भी जिये, अपनी शर्ताे पर जिये। अपने रंग में जिये। और अपने रंग बिखेरते हुए इस रंगमहल से विदा भी हुए। जीवन की ऐसी सम्पूर्णता बहुत कम लोगों को प्राप्त होती है। उन हर शब्द में अनन्त कोटि हृदयों को आंदोलित करने की ऊर्जा है। निश्चित रूप से वे सदैव हमारे साथ रहेगे। कोटिशः नमन!

जी हां, संसार नश्वर है। उनका यह गीत धैर्य की प्रेरणा भी देता है-
स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठें कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क बन गए,छंद हो दफन गए,
साथ के सभी दिए धुआँ-धुआँ पहन गए,
और हम झुके-झुके, मोड़ पर रुके-रुके,
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शाबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना सिहर उठा,
इस तरफ़ ज़मीन और आसमाँ उधर उठा
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ, ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गई कली-कली कि घुट गई गली-गली,
और हम लुटे-लुटे, वक्त से पिटे-पिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुजर गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यों कि स्वर्ग भूमि पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर, शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर
कि दह गए किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे, नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

माँग भर चली कि एक, जब नई-नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमुक उठे चरन-चरन,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी ज़हर भरी, गाज एक वह गिरी,
पोंछ गया सिंदूर तार-तार हुईं चूनरी,
और हम अजान-से, दूर के मकान से,
पालकी लिए हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

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