भारत भारतीयों का या घुुसपैठियों का?


डॉ विनोद बब्बर

आज अगर यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछे, ‘वर्तमान का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?’ तो युधिष्ठिर का उत्तर होगा, ‘कोई एक आश्चर्य हो तो कहूं। यहां तो एक से बढ़कर एक आश्चर्य हैं। अपने सीमित संसाधनों वाले घर में घुुसे लोगों को निकाल बाहर करने की बजाय कुछ भारतीय उन्हें बचाने की कोशिश कर रहे हैं। जो ममता बनर्जी 2005 में संसद में बंगलादेशी घुसपैठियों को आफत बताते हुए हंगामा करती हैं। अपनी बात न सुने जाने पर नाराज होकर अपना इस्तीफा सभापति पर फेंकती है वही ममता आज उन्हीं बंगलादेशी घुसपैठियों की पैरोकार बन गृहयुद्ध की धमकी दे रही है। जिस कांग्रेस के नेता राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री के रूप में 14 अगस्त 1985 को असम के छात्र नेताओं से समझौता किया था जिसके अनुसार घुसपैठिए को चुनकर बाहर किया जाना था। उसी कांग्रेस का दिल बंगलादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों के लिए धडक रहा है। भारत के ही कश्मीर के मूल निवासी और सदियों से वहां रह रहे लाखों हिन्दुओ को कश्मीर से निकाले जाने पर मौन रहने वाले अवैध बांग्लादेशियों की सूची आने पर ही शोर मचा रहे है।’
सच ही है भारत आश्चर्यों का देश है, जहां हर फैसला तत्कालिक राजनैतिक लाभ-हानि के आधार पर लिया जाता है। सुुप्रीम कोर्ट को सुप्रीम बताने वाले कब सुप्रीम कोर्ट के आदेश की धज्जियां उड़ाने लगे, कहना कठिन है। अयोध्या मामले में कोर्ट का फैसला मानने की नसीहत देने वालों ने शाहबानों मामले में सुप्रीम कोर्ट का मानवीय निर्णय स्वीकार नहीं था। वोट बैंक की खातिर जिन्हें सबके लिए समान कानून स्वीकार नहीं वे लोग ही अपने नेताओं के द्वारा किये गये फैसले को भी नकारने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
आखिर किसी देश की पहली जिम्मेवारी अपने नागरिक हैं या घुसपैठिये? शासन की प्राथमिकता राष्ट्रीय सुरक्षा हो या अपनी कुर्सी की सुुरक्षा? न्याय की परिभाषा दोषी का धर्म देखकर बदलने या पिघलने लगे तो आप स्वयं को किस तरह से धर्मनिरपेक्ष बता सकते हैं?
किसे याद न होगा कि घुसपैठ के कारण असम के लोगों का जनजीवन बुरी तरफ प्रभावित हुआ था। आदिवासियों बाहुल्य गांवों का संतुलन इतनी तेजी से बदला कि अब वे अपने ही घर में अल्पसंख्यक हो चुके हैं। 1979 में ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) और असम गण परिषद ने घुसपैठियों को बाहर निकालने का आंदोलन शुरु किया था। 6 साल तक चला यह बहुचर्चित आंदोलन हिंसक होकर हजारों को निगल गया। तब 14 अगस्त 1985 को उस समय देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उनसे समझौता किया जिसकी घोषणा उन्होंने स्वयं लालकिले की प्राचीर से करते हुए जानकारी दी थी कि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) बनाया जायेगा ताकि घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें बाहर किया जा सके। तत्कालीन गृहमंत्री पी.वी. चिदंबरम ने भी संसद में कहा था कि घुसपैठियों के लिए देश में जगह नहीं है। 1971 युद्ध में बंगलादेशी के निर्माण में मदद करने वाली इंदिरा जी ने कहा था कि शरणार्थी और घुसपैठिए दोनों का अलग मसले है। किसी भी घुसपैठिए के लिए देश में कोई जगह नहीं है। दुर्भाग्य यह कि वोट बैंक की राजनीति के कारण जो घुसपैठियों को बाहर करने का साहस नहीं कर सके आज वहीं देश की सुरक्षा को ताक पर रख वोटबैंक के लिए एनआरसी का विरोध कर रहे हैं। वे इस बात को भी नजर अंदाज कर रहे हैं कि यह मुद्दा 2005 से लगातार उठता रहा है। ममता बनर्जी ने ही नहीं भाजपा ने भी इसे बार-बार उठाया। 2013 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद कोर्ट के आदेश पर तत्कालिक सरकार ने नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) बनाने की ओर कदम उठाया। देशभर में इसपर काम शुुरु हुआ। असम में पहली सूची जारी होने पर जिन 40 लाख लोगों के नाम उसमें नहीं है, उन्हें भी अपना पक्ष प्रस्तुत करने का अधिकार हैं। यदि वे 1971 तक भारत में प्रवेश कर चुके थे तो भी उन्हें निकाला नहीं जायेगा। इतने स्पष्ट आश्वासन के बाद भी कुछन लोगों को अचानक देश का संविधान से लेकर मानवता तक खतरे में दिखाई देने लगती है। उनका न्यायिक-व्यवस्था सेे विश्वास हट जाता है। समझा जा सकता है ये कौन लोग हैं। विचारणीय है कि क्या ये वहीं लोग है जिनका दावा रहा है कि ‘देश के संसाधनों पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकों का हैं’। क्या ये वहीं लोग हैं जो तुष्टीकरण के लिए जाने जाते हैं। क्या ये वहीं लोग है जो देश के विभाजन के समय विश्व के सबसे बड़े कत्लेाखैरत को नहीं रोक सके थे। क्या ये वहीं लोग है जिनके लिए ‘बड़ा पेड़ गिरने पर जमीन हिलती है।’ जो उन्नीस सौ चौरासी ही नहीं उससे पहले और उसके बाद भी साम्प्रदायिक दंगों को रोकने में विफल रहे।
क्या यह आश्चर्य नहीं कि कुछ लोग घुसपैठियों, आतंकियों, पत्थरबाजों या नक्सलियों पर सख्ती के विरोधी है। तुष्टीकरण समाप्त करने के प्रयासों पर छाती पीटते हैं, परंतु इस देश के बहुसंख्यक लोगों की भावनाओं की उन्हें जरा भी परवाह नहीं। वरना खुलेआम बीफ पार्टी आयोजित करते? केरल में सड़क पर गौवध करते? गौवध रोकने के लिए हुए आंदोलन को नफरत की राजनीति घोषित करने वालो को स्पष्ट करना चाहिए कि घुसपैठियों की सूची जारी होने मात्र पर ही सुश्री ममता जी की गृहयुद्ध की धमकी क्या शांति संदेश हैं?
2001-2011 के बीच असम में हिंदू जनसंख्या वृद्धि दर 11 तो मुस्लिम 30 प्रतिशत है। यह सीधे-सीधे घुसपैठ का परिणाम है। असम में लगातार जारी रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को जारी नहीं रहने दिया जा सकता। देश की संप्रभुता और अखंडता पर प्रहार करने वालों से सख्ती से निपटना सरकार की जिम्मेवारी है। यदि वह ऐसा करने में विफल रहती है तो उसे शासन का अधिकार नहीं है। सीमा पर सख्ती के साथ-साथ देश में घुस आये लोगों को निकाल बाहर बरना ही होगा। तय करना ही पड़ेगा कि आजादी के 71 साल बाद भी जब हम अपने सभी लोगों तक सुविधाएं नहीं पहुंचा सके तो हमंे दूसरो की अवैध संतानों की चिंता क्यों करनी चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्हें अवैध घुसपैठियों को निकाल बाहर करने में अपना भविष्य संकट में पडता दिखाई देता हो। मानवाधिकार का रोना रोने वालों को असम के उन गरीबों के मानवाधिकार की चिंता क्यों नहीं जिनके रोजगार छिन रहे हैं, स्वास्थ्य और शिक्षा के अवसर छिन रहे हैं। वे गरीबी, बेकारी, पिछड़ापन में जीने को अभिशप्त क्यों?
देश की राजधानी दिल्ली सहित देश के विभिन्न भागों में तेजी से बढ़़ी झुग्गी-झोपड़ियों की कतार का सत्य क्या है? कुकुरमुत्ते की तरह से उगी झोपड़ियों में बांग्लादेशी होने के आरोप लगते रहे हैं। इनकी अपराधिक गतिविधियों में सहभागिता की पुष्टि देश के विभिन्न राज्यों की पुलिस कर चुकी है। किसी भी देश का नागरिक उस देश की ज़िम्मेदारी है। यदि किसी देश के नागरिक अपने देश की सामर्थ्य को इस योग्य नहीं मानते तो उन्हें दूसरे देश में रोजी-रोटी की तलाश में केवल वैध तरीके से ही प्रवेश का अधिकार है। अवैध तरीके प्रवेश दंडनीय है। यदि वे भारत में रहने के इतने ही इच्छुक हैं तो उन्हें चाहिए कि वे अपने देश वापस लौटकर उसके भारत में विलय का आंदोलन चलाये। उसके बाद वे वैध भारतीय बनकर यहां रह सकते हैं। ममता जी, बताये कि गृहयुद्ध की धमकी देने की बजाय उन्हें यह सुझाव क्यों नहीं देना चाहती?

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