एक दिया शुभ संकल्प का भी


डॉ. विनोद बब्बर

दीपावली कूड़े, कचरे संग कुविचारों और दुर्भावों से मुक्ति पाकर स्वच्छता, सदविचारों, सुकर्मों का दीप प्रवज्जलित करने का महा उत्सव है। दीपावली से पूर्व ही घर-आंगन की साफ-सफाई का अभियान शुरु किया जाता है। न केवल अपने घर बल्कि आसपास को गंदगी से तो हम करते ही है। तो क्यों न यह संकल्प भी ले कि अपने परिवेश को साफ रखेंगे। कूड़ा केवल और केवल कूड़ेदान में ही डालेंगे। इधर -उधर थूकना, कागज या छिलके फेंकना हमारे परिवेश को गंदा करता है। इसके कारण अनेक बार हमें विदेशियों के सामने शर्मिंदा होना पड़ता हैं तो इस गंदगी में अनेक कीटाणु, रोगाणु पनपते हैं जो अनेक रोगों का कारण बनते हैं। अपनी थोड़ी सी लापरवाही की हमें भारी कीमत चुकानी पड़ती है। अनेक बार तो गंदगी में पनपे विषाणु जानलेवा भी हो जाते हैं। इससे हमे सबक ले सकते है कि गंदगी शानलेवा है तो जानलेवा भी है। स्वच्छता मन को शांति देती है, तन को निरोग प्रदान करती हैं, तो व्यवसायिक स्थल को आकर्षण व समृद्धि देती है।
परिवेश की गंदगी के बाद हमें अपने मन- मस्तिष्क को भी हर प्रकार की गंदगी से मुक्त करने के लिए ज्ञान का एक दीपक अपनेे मन -मस्तिष्क में जलाना चाहिए। आखिर क्यों हम अपने मन-मस्तिष्क में नकारात्मकता, घृणा, द्वेष, संकीर्णता, उन्माद, हिंसा, अहंकार, आलस्य, स्वार्थ जैसा कचरा रखें। क्यों न इस कचरे को निकाल बाहर कर स्वयं भी तनाव मुक्त हो और अपने परिवार, परिवेश को भी तनावों के बोझ से मुक्त करें। यदि हम इस कचरे से छुटकारा पा सके तो उस बदबू के स्थान पर सकारात्मकता, रचनात्मकता, धैर्य, विवेक, साहस, प्रेम, सौहार्द, दया, करुणा की सुगंध हमंे और हमारे समाज को आनंदित करती रहेगी। तब एक दिन नहीं, हमेशा दिवाली सा उजास रहेगा।
दिवाली पर अपने घर आंगन, चैराहे सहित अनेक अन्य स्थानों पर भी दीप जलाने की प्रथा हमारे पूर्वजों ने अकारण नहीं बनाई होगी। ऐसा करते हुए उनके मन में यह विचार अवश्य रहा होगा कि हमारे आसपास का कोई स्थान सूना न रहे। इस अवसर पर उपहार और मिठाई बांटने का अर्थ भी यहीं रहा होगा कि गरीब, बीमार अथवा किसी कारण से अभावग्रस्त के जीवन में अंधकार शेष न रहने पाये। हमारी खुशियां तब तक अधूरी जब तक हम दूसरों को उसमें शामिल न करें। क्या हम तैयार हैं अपने दूरदर्शी पूर्वजों की इस सद्इच्छा को पूरा करने के लिए? यदि हां, तो आओ, किसी अनाथाश्रम एवं वृद्धाश्रम की ओर चले जहां हमारी उपस्थिति वहां रहने वालों के चेहरे पर मुस्कान ला सकती है। हमारा छोटा सा प्रयास उनके जीवन में खुशियां की बहार ला सकता हैं। पटाखों पर धन बर्बाद करने के स्थान पर एक गरीब बच्चे की साल भर की स्कूल फीस, पुस्तकंे, पाठन सामग्री की व्यवस्था कर आपकी भी बहुत खुशी होगी। तो आओ ऐसी सच्ची खुशी पाने के लिए कदम बढ़ाये!
दिवाली के अवसर पर आप भी अपने मित्रों, स्वजनों को उपहार देंगे। लेकिन उपहार में वहीं जल्दी खराब होने वाली मिठाई या प्रदूषण फैलाने वाले पटाखे ही क्यों? सद्ज्ञान देने वाली पुस्तकंे क्यों नहीं? उपहार देते समय उसकी चमक-दमक या पैंकिंग की बजाय उसके गुणवता को प्राथमिकता दें। ऐसी वस्तुएं उपहार में देने का प्रयास करें जो टिकाऊ हो और जो दीर्घकाल तक याद रखी जा सके। जैसे पढ़ने वाले छात्रों को अच्छा सा पैन भेंट करे तो गृहिणी को रसोई में मदद करने वाला कोई सुंदर टिकाऊ मगर कम कीमत का उपकरण दिया जा सकता है। जल्दी खराब होने वाली मिठाई के स्थान पर फलों के मुरब्बे, शर्बत, च्यवनप्राश का विकल्प मौजूद है तो इन पर विचार जरूर करना चाहिए।
त्यौहार और खुशियों का चोली दामन का साथ है। ये खुशियां यदि स्थाई हो जाये तो समझो वहीं वास्तविक दिवाली है। मनुष्य को सच्ची खुशी किसी वस्तु को पाने से नहीं मिलती है। मिलती जरूर हैं पर वह खुशी क्षणिक या कुछ अधिक होती है। स्कूटर या कार या एसी के मिलने पर आनंद की अनुभूति एक सीमा तक ही रहती है। लेकिन अपनी किसी बुरी आदत को त्याग कर आप समय और संसाधन का सदुपयोग परिवार और समाज के लिए कर सकते है। आप भली भांति जानते हैं कि बुरी आदत घोर अंधकार का पर्याय है। तो क्यों न दीपपर्व पर इस अंधकार के स्थान पर सद्चरित्रता का दीप जलाये। नियम बनाये शाम भोजन अपने पूरे परिवार के साथ ही लेंगे। परिवार का मतलब केवल मैं, मेरी पत्नी, मेरे बच्चों तक सीमित नहीं होना चाहिए। मेरी मां, मेरे पिता, मेरे भाई, भतीजे आदि भी साथ हो तो खुशियां सहस्र गुणित हो जायेगी। परिवार का मतलब एक दूसरे से ‘वार’(युद्ध) नहीं बल्कि एक- दूसरे पर अपना सर्वस्व ‘वार’ (न्यौछावर) कर प्रेम सद्भावना की रक्षा करना होता है।
खुशियां तब तक अधूरी हैं जब तक तन निरोगी न हो। कहा भी गया है- ‘पहला सुख निरोगी काया’। अगर रोग, व्याधि हमारे तन में ठिकाना बना ले तो क्या होली, क्या दिवाली। त्यौहार का आनंद समाप्त हो जाता है। तो क्यों न हम इस दिवाली अपने तन को निरोग रखने की शुरूआत करें। हर रात्रि समय पर सोना, हर सुबह जल्दी उठकर ताजी हवा का रसास्वादन के लिए के लिए एक दो दिन आप कष्ट उठाकर भी प्रयास करें। कुछ दिनों में आपको अच्छा लगने लगेगा। मील-दो मील की सैर, थोड़ा व्यायाम, प्राणायाम, कुछ मित्रों संग हंसी ठिठोली। बस और क्या चाहिए, यहीं है असली होली। असली दिवाली। हां, इससे बचने के बहाने हजार हो सकते हैं- ‘अच्छा ठीक है, कल से शुरु करेंगे। जिम ज्वाइंन करेंगे। मेरा एक दोस्त कल मुझे फोन करेगा। ओह अकेला जाना अच्छा थोड़ी लगता है। सुबह इतनी प्यारी नींद आती है, उसे छोड़कर पार्क जाना कहां की समझदारी है।’ वगैरह, वगैरह। ये बहाने अपनी जगह, लेकिन इस दीवाली आप संकल्प कीजिए, किसी भी बहाने में नहीं बहना है। स्थाई खुशी, आनंद से रहना है तो हर सुबह सूर्योदय को खुली हवा में ‘सुप्रभात’ कहना है।
आपको विश्वास दिलाने की आवश्यकता नहीं क्योंकि आप सब कुछ भली भांति जानते हैैं कि मात्र कुछ दिनों के अभ्यास से ही आपकी दुनिया बदल जायेगी। परिवेश स्वच्छ, तन स्वस्थ, मन प्रसन्न और परिवार में खुशहाली। समाज अपेक्षाकृत खुशहाल। धन अपनी जगह लेकिन खुशी अपनी जगह है। ये दोनो आरंभ में एक दूसरे की थोड़ी मदद तो शायद कर सकते हैं लेकिन इस बात की गारंटी नहीं कि धन से सुख मिलेगा ही। आपके परिचित बहुत से ऐसे लोग हो सकते हैं जो बहुत धनवान है। लेकिन बहुत सुखी भी हो ऐसा जरूरी नहीं है। अगर धन पाकर स्वास्थ्य गवां दिया। अगर धन की दौड़ में परिवार को समय देना भूला दिया। अगर धन की हवस में बच्चों को संस्कार देना याद नहीं रहा। धन की अंधी दौड़ में अच्छे बुरे का अंतर नहीं समझा। स्वार्थ के लिए अपने परिवेश में पसरते घुसपैठियों के प्रति सजग नहीं रहे। तो सुखी होना तो दूर की बात, आपका जीना दूभर हो जायेगा। आप स्वयं को अपराधी मानते हुए कहेंगे-
‘मिले ना फूल तो काँटों से दोस्ती कर ली
इसी तरह से बसर हम ने जिन्दगी कर ली
जिन्हें प्यार था चांदी से, इश्क सोने से
वही कहेंगे कभी हम ने खुदखुशी कर ली!’

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