एक गृहस्थ के लिए गीता का महत्व


नत्थी सिंह बघेल

श्रीमद् भगवत् गीता एक ऐसा विलक्षण ग्रंथ है जिसका आज तक न तो कोई पार पा सका है, न पार पाता है, और न पार पा ही सकेेगा। गहरे उतर कर इस का अध्ययन-मनन करने पर नित्य नये नये विलक्षण भाव प्रकट होते रहते हैं, जिससे मन-बुद्धि चकित होकर तृप्त हो जाती है।
जिन लोगों ने गीता केवल नाममात्र ही सुना है, वे कह दिया करते हैं कि गीता केवल सन्यासियों के लिए है, गृहस्थियों के लिए नही है। कहीं गीता पढकर, सुनकर उनके बच्चे सन्यासी न बन जाएं। परंतु ऐसे सोचने वालों के लिए यह केवल एक भ्रम ही है। क्योंकि क्षात्र धर्म से विमुख होकर भिक्षा के अन्न से निर्वाह करने को तैयार अर्जुन ने जिस परम रहस्यमय गीता के उपदेश से आजीवन गृहस्थ में रहकर अपने कर्तव्य का पालन किया उस गीता शास्त्र का यह उल्टा परिणाम किस प्रकार हो सकता है? गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी मनुष्य त्याग के द्वारा तथा शास्त्रसम्मत कर्म द्वारा परमात्मा की प्राप्ति कर सकता है। परमात्मा प्राप्ति कें लिए त्याग ही मुख्य साधन है। एक गृहस्थ के लिए श्रीमद् भगवत् गीता का जीवन के हर क्षेत्र में अत्यधिक महत्व है। निम्न प्रमुख बिंदुओं पर प्रकाश ड़ालना सारगर्भित होगाः
निष्काम कर्मः-गीता का सर्वप्रथम संदेश है कि व्यक्ति को कभी भी अपने कर्म से विमुख नही होना चाहिए। गीता गृहस्थ में आत्मीयता और एकता की भावना का संदेश मुख्य रूप से निहित है। अतः गृहस्थ और समाज को गीता का संदेश प्रत्यक्ष रूप से जीवन में उतारना श्रेष्ठकर है, जो उत्क्ष्ट जीवन जीने का सबसे बड़ा स्त्रोत है। अर्जुन जब मोहवश कुरूक्षेत्र युद्धभूमि में अपने कर्म से भटक कर युद्ध न करने की ठान कर धनुष-बाण त्याग निराश होकर रथ के पिछले भाग में बैठ गया था तो भगवान श्रीकृष्ण ने उसे कर्तव्य बोध कराते हुए कहा कि अपने कर्म से विमुख होकर यदि तू धर्म-युद्ध नही करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति खोकर पाप को प्राप्त होगा-गीता ;2/33द्ध। सुख-दुःख, जय-पराजय, लाभ-हानि को समान समझकर युद्ध के लिए तैयार किया क्योंकि धर्म युद्ध करने से व्यक्ति पाप का भोगी नही होता। जो व्यक्ति समपूर्णं कामनाओं को त्यागकर ममता, अहंकार और स्पृहा रहित हुआ कर्म करता है वह शांति को प्राप्त होता है ;2/71द्ध
मनः प्रसादः मन की प्रसन्नता को मनः प्रसाद कहते हैं ;17ध्16द्ध, गीता में मन की प्रसन्नता का बहुत महत्व है जो एक गृहस्थ के लिए अनिवार्य है। हर व्यक्ति को प्रतिकूल परिस्थितियों में भी प्रसन्न रहा चाहिए। अपने उपर परिस्थिति ़का असर नही पड़ने दे। दूसरों की प्रतिकूल बात सुनकर भी सौम्य रहे। मन की स्वतंत्रता का त्याग करें क्योंकि मन को स्वतंत्र छोड़ने पर सुख भोग हो जाते हैं। मनन-षीलता नही आती। मन की मूढ, क्षिप्त औ विक्षिप्त वृतियों का त्याग करें। अपने मन में किसी के अहित का भाव न हो। यह सब मन संबंधि तप है। गीता का आदि से अंत तक अध्ययन करने पर यह असर पड़ता है कि इस का उद््देष्य केवल जीव कल्याण करने का है। कारण कि अर्जुन जो प्रष्न है वह निष्चित श्रेय-कल्याण का है। भगवान ने जितने साधन बताये हैं वे सब जीव का निष्चित कल्याण हो जाए, इस लक्ष्य को लेकर बताये हैं। संयोग से उत्पन्न होने वाली प्रसन्नता स्थायीरूप से हरदम नही रह सकती, क्योंकि जिस की उत्पत्ति होती है, वह वस्तु कदापि स्थायी रहने वाली नही होती। परंतु दुर्गुगुण-दुराचारों से संबंध विच्छेद हो जाने पर जो स्थायी तथा स्वभाविक प्रसन्नता प्रकट होगी वह हरदम रहती है और वहाॅ प्रसन्नता मन, बुद्धि आदि में आती है जिससे मनमें कभी अषांति होती ही नही अर्थात् मन हरदम प्रसन्न रहता है।
कर्म और अधिकारः मानव योनि पाने पर मनुष्य को कर्म करने का अवसर प्राप्त होता है जिस पर उसका अधिकार होता है, परंतु उसे उसके बदले में फल की इच्छा नही करनी चाहिए ;2ध्47द्ध क्योंकि कर्म करने के पष्चात् उसका परिणाम मनुश्य के अपने हाथ में नही होता है। अतः गृहस्थ में रहकर व्यक्ति को अपने कर्म के महत्व को समझना आवष्यक है। गीता का यह अति महत्वपूर्ण निश्काम भाव से कर्म करने की प्र्रेरणा का स्त्रोत है। कर्म करने का अधिकार तो सभी को है चाहे वह गृहस्थी हो, सन्यासी हो, ब्रह्मचारी हो या अन्य कोई हो। अतः फल के प्रति मोह न रखते हुए कर्म को उत्कृष्ट मान कर समबुद्धि रखते हुए जीवन जीना चाहिए।
सत्-असत्ः मानव जीवन विषेश कर गृहस्थ जीवन में सत् और असत् का बड़ा महत्व है क्योंकि असत् भाव की सत्ता विद्यमान ही नही रहती और सत् का कभी अभाव नही होता। तत्वदर्षी महापुरूशों ने इन दोनों का ही तत्व देखा अर्थात् अनुभव किया। जिसके आधार पर सत् अर्थात् सत्य हमेषा रहता है और असत् अर्थात् झूठ कभी टिकता नही है। अतः गृहस्थ जीवन में सत् और असत् के अंतर को समझना अति महत्वपूर्ण है। ;2ध्16द्ध
यज्ञ का महत्व वैदिक संस्कृति के अनुसार हिंदू धर्म में प्रत्येक गृहस्थी को हवन-यज्ञ अवष्य करना चाहिए। भगवान श्री कृश्ण ने यज्ञ का महत्व बताते हुए गीता मे कहा हैकि सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न हो हैं, अन्न की उत्पत्ति वृश्टि से होती है, वृश्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ निहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है। कर्म समुदाय को वेद से उत्पन्न और वेद को अविनाषी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान। इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में पेतिश्ठित है। ;3ध्14 – 15द्ध
कर्म बोधः प्रत्येक व्यक्ति को षास्त्र सम्मत अपना कर्तव्य-कर्म बोध होना अति आवष्यक है। गृहस्थ के लिए तो कर्तव्य कर्म का अति महत्व है जिस के विशय में भगवान ने कर्तव्य कर्म न छोड़ने के लिए प्रकरण का प्रकरण ही कहा है। कर्मों का त्याग करने से न तो निश्कर्मता ही प्राप्त होती है और न ही सिद्धि होती है। ;3ध्4द्ध कोई भी मनुश्य किसी अवस्था में क्षणभर भी कर्म किये बिना नही रह सकता। ;3ध्5द्ध जो बाहर से कर्मों का त्याग करके भीतर से विशयों का चिन्तन करता है वह मिथ्याचारी है ;3ध्6द्ध जो मन-इन्दिेयों को वष में करके कर्तव्य कर्म करता है वही श्रेश्ठ है ;3ध्7द्ध । कर्म किये बिना षरीर का निर्वाह भी नही होता। इसलिए कर्म करना चाहिए। जो कर्तव्य का पालन किये बिना प्राप्त सामग्री का उपभोग करता है वह चोर है ;3ध्12द्ध । कर्तव्य कर्म करके अपना निर्वाह करने वाला सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है। कर्तव्य पालन से सृश्टिचक्र चलता है परंतु जो सृष्टि में रह कर अपने कर्तव्य का पालन नही करता उसका जीना व्सर्थ है। ;3ध्16द्ध
स्वधर्म श्रेश्ठताः गीता के अठाहरवें अध्याय केे सैंतालीसवें ष्लोक के अनुसार भगवान श्रीकृश्ण निज धर्म का महत्व समझाते हुए कहते हैं कि अच्छी तरह अनुश्ठान किये हुए परधर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेश्ठ है क्योंकि स्वभाव से नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्म करता हुआ मनुश्य पाप को प्राप्त नही होता। इसलिए एक गृहस्थी को अपने धर्म में अटूट विष्वास और आस्था रखनी चाहिए और निजधर्म का पालन करना चाहिए। यह गीता का महत्वपूर्ण संदेष है।
समता और समानताः भगवान ने गीता में एक अति विलक्षण बात बतायी है जिसका गृहस्थ में बहुत ही महत्व है। भगवान ने कहा है कि ब्राह्मण, क्षत्री, वैैष्य और षूद्र अपने-अपने वर्णोचित कर्मों के द्वारा उस परमात्मा का पूजन करके परम सिद्धि को प्राप्त हो जाते हैं। ;18ध्16द्ध वास्तव में कल्याण वर्णोचित कर्मों से नही होता, प्रत्युत निश्काम भाव पूर्वक पूजन से ही होता है। षूद्र तो स्वभाविक कर्म परिचार्यत्मक अर्थात् पूजन रूप है अतः उसका पूजन द्वारा पूजन होता है यानी उसके द्वारा दुगनी पूजा होती है। इसलिए उसका कल्याण जितनी जल्दी होता है उतनी जल्दी ब्राह्मण आदि का नही होगा। इसलिए मनुश्य जाति को लेकर अपने को न उंचा और न नीचा समझे बल्कि घड़ोें के पुर्जे की तरह अपना ठीक से कर्तव्य पालन करे और दूसरों की निंदा, तिरस्कार न करे तथा अपना अभिमान भी न करे तब ही अभिरति होगी। ;6ध्4द्ध
गीता सुगीता करने योग्य है अथात् श्री गीता जी को भली प्रकार पढकर अर्थ और भाव सहित अन्तःकरण में धारण कर लेना एक गृळस्थ के लिए अति महत्वपूर्ण है क्योंकि गीता श्री भगवान के मुखारविंद से निकली है फिर अन्य षास्त्रों के विस्तार से क्या प्रयोजन है? स्वयं भगवान ने भी इसका माहात्म्य अन्त में ;18ध्68 जव71द्ध में वर्णन किया है।

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