एक आवाज शोर के खिलाफ


डा. विनोद बब्बर

पिछले दिनों प्रातः आजान से नींद टूटने से संबंधित प्रसिद्ध गायक सोनू निगम के एक बहुचर्चित टिवट् और उसपर एक मुस्लिम नेता द्वारा ‘सिर मुंडने वाले को दस लाख इनाम’ के ऐलान की खूब चर्चा रही। कोई इस टिप्पणी को मुस्लिम विरोधी करार देने में अपनी ऊर्जा लगा रहा था तो उसके पक्ष में चिल्ला रहा था। जबकि सोनू ने स्पष्ट कहा कि ‘मेरे बयान को गलत ढंग से पेश किया जा रहा है। मेरा मानना है कि लाउडस्पीकर धार्मिक स्थलों पर नहीं होने चाहिए। धर्म के नाम पर शोर मचाना गुंडागर्दी है।’ इस तथ्य से शायद ही कोई असहमत हो कि शोर अदृश्य होते हुए भी एक बहुत बड़ी समस्या बन चुका है। लेकिन दुखद आश्चर्य है कि इस शोर में ध्वनि प्रदूषण का मुद्दा गौण होकर रह गया। अनेक लोग शोर के विरूद्ध इस बयान के समर्थक होते हुए भी इसलिए मौन रहे कि उन्हें साम्प्रदायिक, अधार्मिक, अथवा नास्तिक न मान लिया जाये। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम धर्म और आडंबर के अंतर को ठीक से समझ अथवा परिभाषित नहीं कर पा रहे है जबकि आज से सैंकड़ों वर्ष कबीर ने ढ़ंके की चोट पर कहा था-
कांकर-पाथर जोड़ि के, मस्जिद लई चुनाय। ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, बहरा भया ख़ुदाय।। यहां यह समझना जरूरी है कि कबीर किसी एक आडंबर पर ही मुखर नहीं होते। वे हर धर्म सम्प्रदाय के आडंबर पर समान रूप से अपनी आवाज उठाते हैं।
पिछले दिनों एक विशाल भगवती जागरण के मधुर भजन और गीत थोड़ी-ही देर में कान फोड़ू शोर में बदल गये। उस पर भी, एक बहुत बड़ा जनरेटर सारी रात अपनीं कर्कश आवाज में ’सोना मना है!’ का संदेश प्रसारित करता रहा। रात-भर चले इस कोहराम के कारण नींद आने का तो प्रश्न-ही नहीं था, भयंकर सिरदर्द और अशांत मन के कारण अगले दिन भी बेचैनी बनी रहीं। यह केवल मेरी पीड़ा नहीं है। लगभग सभी नगरों, महानगरों में वाहनों का शोर, होर्न की चिल्लपौ, धार्मिक स्थलों के अतिरिक्त किसी भी उत्सव, चुनावी सभाओं, जलसे-जलूस, शोभायात्रा में बजाते लाउड-स्पीकरों का शोर के विरोधी स्वर भी बढ़ रहे हैं।
हमारे एक मित्र के अनुसार, ‘वर्षोंें पहले जब चौड़ी रोड़ का मकान खरीदा, तो सभी ने हमारी दूरदर्शिता का लोहा माना। आखिर, हर दुःख-सुख में घर के सामने चौड़ा स्थान चाहिए। चौड़ी गली में वाहन खड़े करने की असुविधा भी नहीं। पर कुछ ही दिनों में हमें अपनी दूरदर्शिता एक समस्या दिखाई देने लगी क्योंकि दिन-रात वाहनों के शोर ने हमारा जीना हराम कर दिया था। खुला स्थान देखकर दूसरे लोग भी हमारे घर के ठीक सामने टेंट लगवाकर अपने कार्यक्रम करते। दूसरों की खुशियां हमारे लिए दुःख का कारण बनने लगीं क्योंकि हर रोज़ तेज़ आवाज में डीजे का संगीत, ढोल-बैंड, आतिशबाजी के बाद भी नाचने-गाने की आवाजें हमारीे रातों की नींद उड़ाने लगीं। कुछ कहने पर ‘एक ही रात की तो बात है’, ’क्या आप इतना भी एडजेस्ट नहीं कर सकते तो फिर कैसे सोशल हो’ जैसे जुमले सुनने को मिलते हैं। पर उन्हें कौन समझाए कि उनके लिए तो एक रात की बात है, जबकि भुगतने वाले के लिए तो लगभग हर रात की यही कहानी है। आखिर, वह कैसे जिये, कहां जाकर अपनी नींद पूरी करें? क्या बिना नींद के कोई व्यक्ति शांत रह सकता है? यदि नहीं तो आखिर क्या करें?
एक अन्य भुक्तभोगी ने शोर के संबंध में अपनी व्यथा कुछ यूं बतायी, ‘शोर तो चहूँ ओर है। तेज आवाज में चलते डीजे और टीवी ही शांति भंग करने के लिए काफी थे। पर कोढ़ में खाज तब हुई जब हमारे घर के ठीक सामने नाई की दुकान खुल गई जहाँ सवेरे-से ही तेज आवाज में टेप रिकार्डर बजने लगता। बार-बार अनुरोध करने पर भी जब कोई रास्ता नहीं निकला तो कटिंग सैलून वाले से सुबह और शाम में दो घंटे धीमी आवाज में टेपरिकार्डर बजाने का सौदा हुआ। उसकी इस कृपा के लिए मैं उसे नियमित रूप से ‘जजिया’ चुकाना पड़ता हैूँ। आखिर शांति की यह कीमत ज्यादा नहीं है।’
यूँ ध्वनि प्रदूषण के विरूद्ध अनेक नियम-अधिनियम हैं, जिन पर हमारी अदालतें बार-बार कड़ी चेतावनी देती है। तेज आवाज़ वाले वाहनांे, जेनरेटर, मशीनें और डैक आदि जब्त करने का प्रावधान भी है। पर फिर भी, शोर से राहत आखिर क्यों नहीं मिलती, इसका कारण भी सभी को ज्ञात है कि यह सुविधा-शुल्क का ज़माना है और दूसरे लाख परेशानी के बावजूद, कोई पुलिस तक शिकायत करने की जहमत नहीं उठाना चाहता।
धार्मिक कार्यक्रमों में कान फोडू तेज आवाज में लाउडस्पीकर बजाना कितना धार्मिक है, यह सवाल बार-बार उठता रहता है क्योंकि शोर से बच्चे, बीमार और बूढ़े ही नहीं, दिनभर मेहनत कर अपने घर लौटे स्वस्थ व्यक्ति भी परेशान हो उठते हैं। उनमें चिड़चिड़ापन होने लगता है, तनाव में रक्तचाप बढ़ जाता है। कान बहरे हो जाते हैं तथा अनेक प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं।
कुछ लोग इसके विरूद्ध तर्क देते हैं कि प्रार्थना, आजान, अरदास सबके लिए शुभ हैं, इसलिए उसें ज्यादा-से-ज्यादा लोगों तक पहुँचाने के लिए लाउडस्पीकर एक प्रभावी माध्यम है। अतः उसके उपयोग पर आपत्ति करना धार्मिक विरूद्ध है। लेकिन, इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया जा सकता हैं। लगभग सभी प्रमुख धर्मों में बताया गया है कि धार्मिक बातें किसी कुपात्र या अनिच्छुक व्यक्ति को नहीं बतानी चाहिए। जो इसमें विश्वास नहीं करते, उन्हें ये बातें सुनाने से धर्म का अनादर होता है। कुरान शरीफ में लिखा है कि ‘लकुम दीनोकुम, वलीया दीन!’ तुम्हारा धर्म तुम्हारे लिए और हमारा धर्म हमारे लिए। यानी यदि कोई शख्स दूसरे धर्म में यकीन करता है, तो उसे जबरन अपने धर्म के बारे में न बताएं। लेकिन, जब हम लाउडस्पीकर पर अजान देते हैं या तरावी पढ़ते हैं तो क्या दूसरे धर्मावलंबियों को जबरन अपनी बातें नहीं सुनाते?
इसी तरह श्रीमद्भागवत गीता के 18वें अध्याय के 67-68 वें श्लोक में कहा गया हैः- इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योभ्यासूयति।। अर्थात् गीता के इस रहस्य को ऐसे आदमी के सामने नहीं रखना चाहिए जिसके पास इसे सुनने का धैर्य नहीं है या जो किसी विशेष स्वार्थ के लिए इसके प्रति श्रद्धा प्रकट कर रहा है या जो इसे सुनने को तैयार नहीं है। लेकिन किसी उत्सव में जब धार्मिक बातें सुनाने के लिए हम लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करते हैं, तो क्या वे बातें ऐसे लोगों के कानों में नहीं पड़तीं जो हिन्दू धर्म के लिए आयोजनों में विश्वास नहीं करते या जो इनमें शोर या अन्य कारणों से कोई न कोई दोष देखते हैं। इसके अगले श्लोक में कृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन! जो मुझमें सचमुच आस्था रखते हैं, वे मेरे इन उपदेशों को मेरे भक्तों में ही बाँटते हैं। कुछ ऐसा ही ईसाई मत के सेंट ल्यूक ने अपने गॉस्पेल में लिखा है कि ‘यदि तुम अपने धर्म का प्रचार करते हुए किसी ऐसे गाँव में पहुँच जाओ, जहाँ के लोग तुम्हारा विरोध कर रहे हों या जो तुम्हें नापसंद करते हों, तो अपने जूते वहीं झाड़ो और आगे बढ़ जाओ।’
निःसंदेह धर्म और आध्यात्मिकता का रिश्ता गहरा है। इनका दिखावे से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं हो सकता। वास्तव में धर्म हमारी निजता है जो हमारे जीवन को शांति, संतुष्टि और पवित्रता से उत्कृष्टता की ओर ले जाने के माध्यम है। लेकिन इसका मतलब हर्गिज नहीं कि इतने मात्र से हमें दूसरों को अशांत करने का अधिकार प्राप्त हो गया। यदि हमारे कारण से किसी को जरा भी कष्ट हो रहा हो तो हमें विचार करना चाहिए कि हम सही पथ पर नहीं है। धर्म आत्मकेन्द्रित, स्वार्थी नहीं बल्कि ‘सबके मंगल’ की कामना का मार्ग है। इसलिए धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझते हुए अपने परिवेश को हर प्रकार के प्रदूषण से बचाने के संकल्प से आंखे चुराना अथवा कुतर्क खोजना उचित नहीं है। आओ समाज की शांति भंग करते हर प्रकार के शोर के विरूद्ध शंखनाद करें!

Clip to Evernote

No Comments