उपभोगवाद से बढ़ रही शोषण की प्रवृति


डा. अंजनी कुमार झा

उपभोग में निहित शोषण की प्रवृति से भारत सहित सभी विकासशील देश जूझ रहे हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों का शिंकजा उपभोक्ताओं के जरिए देशों की सीमाऐं तोड़ता हुआ उनकी सरकारों को जकड़ता जा रहा है।
अगर उपभोग पड़ोसी से होड़ के कारण हो तो वह वास्तव में देशानुकूल नहीं है।
जरूरतों की सीमा कौन तय करे। आदमी स्वयं या अपना माल बेचने के लिए रोजाना नये नुस्खे अपनाने वाली कंपनिया।
चिंताजनक पहलू यह है कि विकासशील देश विकसित देशों की उपभोग शैली का अंधानुकरण कर रहे हैं। विकासशील देशों के सम्पन्न लोगों में समस्त प्रकार के घरेलू उपकरणों, भोग विलास की वस्तुओं एवं कारों इत्यादि पर खुला व्यय कर संपन्न देशों की जीवन शैली को अपनाने की प्रवृति बढ़ रही है। गत वर्ष पश्चिमी यूरोप तथा अमेरिका में जितनी कारें बिकीं उससे कहीं अधिक कारें एशिया मंे बिकीं।
विश्व जनसंख्या में वृद्धि, वन क्षेत्र एवं शुद्ध जल की उपलब्धता में कमी तथा प्राथमिक ऊर्जा की मांग में तीव्र बढ़ोŸारी चिंता का विषय है। यदि वर्तमान उपभोग शैली जारी रही तो गैर नवीकरणीय स्त्रोतों की समाप्ति का अवसर आने से कहीं पूर्व ही नवीकरणीय स्त्रोत उपलब्ध कराने वाली समस्त प्राकृतिक सम्पदा नष्ट हो जायेगी।
अगर दुनिया के सभी व्यक्ति अमेरिकी लोगों की तरह पेट्रोल जलाना आरम्भ करे दें तो वे वायुमंडल में इतनी कार्बनडाईआक्साइड भर देंगे कि विश्व में जीवन दूभर हो जायेगा। गरीब लोगों की इतनी विशाल संख्या है कि धनिक लोगों की विकास और उपभोग नीतियाँ अपनाने का परिणाम होगा पर्यावरण की अपूरणीय क्षति और प्रदूषण। पोषणक्षम उपभोग का निर्धारण करने के लिए विश्वस्तर पर मानक और नियम तय करने होंगे। पोषणक्षम उपभोग की अवधारणा को आवस, स्वास्थ्य, खाद्य, सुरक्षा जैसी मूलभूत आवश्यक्ताओं से जुड़े विकास के पारंपरिक सरोकारों के साथ-साथ बेहतर जीवन स्तर की सहज आकांक्षाओं के साथ भी जोड़ना होगा।
पोषणक्षम उपभोग उन उत्पादों तथा सेवाओं के उपयोग से संबद्ध है जो हमारी मूलभूत आवश्यक्ताएं हैं तथा हमारे जीवन स्तर को बेहतर बनाती हैं, परन्तु इसकी प्राप्ति ऐसी पद्धति से होनी चाहिए जिससे प्राकृतिक संसाधानों का उपयोग न्यूनतम हो और संपूर्ण जीवन-चक्र में अपशिष्ट और प्रदूषकों की मात्रा न्यूनतम रहे। हमें छः पक्षों का ध्यान रखना चाहिए: नैतिकता, समानता, जीवन-शैली, बाजार समुदाय और प्रतिमान।
उपभोग पर तीन कारकों का प्रभाव होता हैः वैश्वीकरण की प्रकिया, व्यापक सम्प्रेक्षण तंत्र की स्ािापना और मनोरंजन तंत्र का पनपना।
वर्तमान में उपभोग एवं उत्पादन की वैश्विक एवं राष्ट्रीय-शैलियों में अत्यधिक असंतुलन है। खाद्य जैसी अनिवार्य वस्तुओं का अतिरिक्त उत्पादन नहीं अपितु निर्धन वर्ग की इन वस्तुओं तक आर्थिक पहुंच परिवर्तन के लिए अवाश्यक है। हम प्रायः अपनी दैनिक आवश्यक्ताओं को पूरा करने के लिए प्राकृतिक पूंजी को खाद्य वस्तुओं, दवाओं, मकानों आदि के रूप में प्रयुक्त अथवा परिवर्तित करते हैं। इसके लिए हम मानवीय, वित्तीय एवं भौतिक पंूजी के आकलन व संतुलन के महत्व पर कोई ध्यान नहीं देते। हमें यह समझना चाहिए कि शुद्ध जल, स्वच्छ वायु व अक्षत वन निःशुल्क प्राप्त हाने वाली वस्तुएं नहीं हैं। ये समस्त हमारी प्राकृतिक पूंजी के अंश हैं और हमें इनका संरक्षण करना चाहिए।
विकास की धारण को और अधिक को और अधिक समग्र रूप में परिभाषित करना होगा। परंपरागत आर्थिक विकास अब पोषणक्षम नहीं माना जा सकता। उत्पादन और उपभोग सामाजिक प्रतिक्रियाएं हैं और ’अपोषणक्षमता’ मूलतः एक सामाजिक व्यवस्थाओं के अंतर्गत समझा जा सकता है और इन समस्याओं का हल करने के लिए हमें सामाजिक मूल्यों में आधारभूत परिवत्रन लाना होगा।
पर्यावरणविद¢् जब उपभोग में कमी की बात करते हैं तो उनका तात्पर्य संसाधनों के प्रयोग में कमी से होता है, जब्कि अर्थशास्त्री इससे लोगों की आय में कटौती का अभिप्राय लगाते हैं। पोषणक्षम उपभोग के लिए वस्तुओं और सेवाओं के उपभोग की मात्रा में कमी करना, उपभोग के स्तर को घटाना मात्र ही अपेक्षित नहीं, अपितु यह देखना भी आवश्यक है कि प्रदूषणकारी वस्तुओं और सेवाओं के द्वारा उपभोग की बेहतर शैलियाँ अपनाकर पर्यावरण की गुणवŸता में यथासंभव सुधार किया जाय। प्रजातांत्रिक समाजों में उपभोग की मात्रा घटाने के स्थान पर उपभोग की शैली सुधारने के लिए दबाव डालना अधिक आसान होगा। सामाजिक स्तर पर तो हमें सामाजिक न्याय पर ध्यान देना होगा। व्यक्तियों से अपनी इच्छाओं का बलिदान कर कम उपभोग करने की अपेक्षा नहीं हानी चाहिए।
हमें एक जनचेतना अभियान की आवश्यक्ता है। जो जीवन की गुणवŸाा और उपभोक्ता शैलियों के पारस्परिक संबध पर प्रकाश डाले। भारत के संबध में स्वयं ऐसी प्रौधौगिकियों का विकास करें। जो कम तापमान एवं दवाब पर कार्य कर सकें तथा जिनमें ऊर्जा की कम खपत हो एवं प्रदूषण भी कम फैले। भारतीय चिंतन में सिद्धांत तत्व और नैतिकता में गहरा संबंध तथा परस्पूरकता है। पोषणक्षम स्थिति को प्राप्त करने के लिए विज्ञान तथा प्रौधौगिकी को सार्थक बनाने हेतु भारतीय ज्ञान सिद्धंात सीखना होगा कि ऐसी विज्ञान प्रणाली कैसे विकसित की जाए जो आध्यामित्क और नैतिकता को तर्क-संगतता से जोड़ सके।
हमें विज्ञान की समग्रता में समझना होगा।

हमें उत्पादन को प्रकृति आधारित बनाए रखना होगा।
प्राकृतिक अर्थ-व्यवस्था अखंड चक्रकार (क्लोज्ड सर्किट) होती है। इसमें परिवर्तन इतना सहज और धीरे होता है कि प्रकृति को पर्यावरण के माध्यम से नवीकरण द्वारा प्रौधौगिकी की विशाल क्षतिपूर्ति का समय मिल जाता है। सामग्री का अवशेष (वेस्ट) कम से कम होना चाहिए। आनुषांगिक उत्पाद (बाइप्रोडक्ट) का उपयोग अथवा उनका पुनः प्रयोग (री-साइक्लिंग) अधिकतम होना चाहिए। ऊर्जा का उपयोग कम से कम करना चाहिए। हमें पुनः प्रकृति की ओर के मंत्र पर निर्भर होना चाहिए। इससे तात्पर्य उपभोग की अपनी आदतों और शैलियों में परिवर्तन लाना मात्र ही नहीं, अपितु उस प्रक्रिया पर भी दृष्टि डालनी है जिसके द्वारा प्रकृति हमारी प्रौधैगिकी विकास को कार्यनीतियों को साकार रूप प्रदान करने में हमारी सहायता करती है।

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