बेसहारा महिलाओं की उम्मीद की किरण उद्योग वर्धिनी


संगीता सचदेवा

परिवार की गुजर बसर के लिए भी जब श्रीमती चन्द्रिका चौहान के पास कुछ ना था तो 1993 में एक दिन उन्होंने अपनी पुरानी सिलाई मशीन निकाली तथा पड़ोस का सिलाई का काम करने लगी | कालान्तर में उनका यही छोटा सा प्रयास अन्य बहनों के लिए उपयोगी सिद्ध हुआ तथा उद्योग वर्धिनी नाम से एक पंजीकृत संस्था का जन्म हुआ| आज उद्योग वर्धिनी से हज़ारों की संख्या में महिलाएं न केवल लाभान्वित हैं अपितु एक पारिवारिक सूत्र में बंध गई हैं| उद्योग वर्धिनी का मुख्य ध्येय स्वयं का एक बडा व्यवसाय बनाना नहीं है अपितु अनेकानेक छोटे व्यवसाय बनाना है |

मुख्य प्रकल्प

नि:संदेह महिलओं के पास अपना व्यवसाय शुरु करने के लिए पर्याप्त रााशि नहीं होती इसलिए श्रीमती चौहान उन्हें 500-5000 रुपये की लागत से व्यवसाय प्रारम्भ करने का सुझाव देती हैं |

अन्नपूर्णा योजना

अन्नपूर्णा एवम् कुछ अन्ययोजनाओं के अन्तर्गत प्रतिदिन 2800 लोगों तक भोजन पहुंचाया जाता है,जिनमें बिमार, गरीब, वृद्ध एवं विद्यार्थी प्रमुख हैं। सोलापुर में ज्वार की पैदावार अधिक होती है इसलिए ज्वार की रोटी प्रसन्नता से खाई जाती है। उद्योग वर्धिनी की 700 बहनों ने 22 घंटे में एक लाख लोगों के लिए एक लाख 75 हजार रोटी बनाकर रिकॉर्ड भी कायम किया है।

सिलाई प्रशिक्षण

उद्योग वर्धिनी में बहनों को फैशन डिज़ाइनिंग, रजाई बनाना, कपड़े के बैग बनाना, कपड़े सिलना एवं है्ंडमेड पेपर बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। उद्योग वर्धिनी द्वारा अनेक अन्य प्रकल्प भी चलाए जाते है। इनमें मुख्य हैं: ब्युटी पार्लर, केटरिंग, किताबों पर जिल्द चढ़ाना, जलावन की लकड़ी बेचना, प्लेसमेंट सेंटर, छोटी किराना/सब्ज़ी की दुकान चलाना आदि। इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण जैसे, सिलाई, कढाई, बुनाई, चाक बनाना,पाक कला, अगरबत्ती बनाना, रंगोली बनाना, दुपहिया वाहन चलाना इत्यादि हैं। उद्योग वर्धिनी द्वारा अनेक सेल्फ हेल्प ग्रुप, सलाह केन्द्र तथा व्यक्तित्व विकास केन्द्र भी चलाए जाते हैं।

यहाँ जो बहने स्वतन्त्र रुप से काम कर सकती हैं उन्हें दो वर्ष कार्य करने के पश्चात अपना स्वयं का लघु उद्योग शुऱू करने के लिए प्रेरित किया जाता है। उन्हें कच्चा माल खरीदना, सामान सही समय पर तैयार करना, मार्केटिंग, बिल बनाना, टैक्स अदा करना इत्यादि सिखाया जाता है। उद्योग वर्धिनी से प्रशिक्षण प्राप्त महिलाओं ने आज विदेशों तक अपना व्यवसाय फैलाया है। उद्योग वर्धिनी वास्तव में बेसहारा महिलाओं के लिए एक सुखद उम्मीद की किरण है।

मंगलदृष्टि वृद्धाश्रम

बेसहारा महिलाओं के लिए वृद्धाश्रम एक वरदान बना हुआ है| इस आश्रम में दृश्टिहीन एवं बेसहारा महिलाऍ भी रहती हैं| उल्लेखनीय है सरकार भी दृश्टिहीन महिलाओं की देखभाल केवल १८ वर्ष तक ही करती है| यहाँ रहने वाली दृश्टिहीन महिलाओं को भी घर के कामकाज से संबन्धित कार्य जैसे- खाना बनाना, साफ सफाई, बर्तन धोना इत्यादि सिखाया जाता है| औसतन ये लडकियाँ प्रतिमाह ३००० तक कमा लेती हैं| केन्द्र द्वारा ८ लडकियों का विवाह भी कराया गया है| श्रीमति चन्द्रिका चौहान ने सिद्ध कर दिखाया है कि महिला ही समाज की वास्तविक वास्तुकार है|

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