उद्देश्य

भारत की चिन्तन परम्परा में ‘वादे वादे जायते तत्वबोधाः’ के सिद्धान्त का बड़ा महत्त्व रहा है। ज्ञान-यात्रा और विचार-यात्रा के सातत्य के लिए तो यह आवश्यक ही है कि भिन्न-भिन्न विचारों और वादों को मानने और जानने वाले लोगों के बीच संवाद-परिसंवाद हो, चर्चा-परिचर्चा चले, वैचारिक घर्षण-संघर्षण हो। घोरतम मतभेद होने पर भी संवाद रुके नहीं, चलता रहे। यदि संवाद चलता रहा, बातचीत जारी रही तो बात-बात में बात बन जाने की संभावना बनी रहती है।

इस प्रकार के विचार-मंथन में से ही सर्वमंगलकारी तत्व एवं सत्व का अमृत निकला करता है। पर आवश्यकता यह है कि यह संवाद प्रामाणिक, पारदर्शी एवं सकारात्मक हो, मत-जड़ता के बन्धन से मुक्त हो तथा परस्पर एक-दूसरे को जानने-समझने-स्वीकारने के भाव से युक्त हो। सकारात्मक संवाद की इसी भावधारा को आगे बढाने के लिए परिचर्चा.कॉम नाम से इस वेबसाइट का शुभारम्भ किया जा रहा है।

परिचर्चा.कॉम के माध्यम से इस सकारात्मक संवाद की यात्रा में सहभागी होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, कृपया आमंत्रण स्वीकार करें।