इन सैनिकों को सलाम करें


सुंदर चंद ठाकुर

सैनिकों को हम गाहे-बगाहे ही याद करते हैं। वे या तो युद्ध के वक्त याद आते हैं, जैसे करगिल की लड़ाई के वक्त याद आए थे या प्राकृतिक आपदा के वक्त याद आते हैं, जैसे पिछले साल उत्तराखंड और इन दिनों जम्मू-कश्मीर की आपदा के वक्त याद आ रहे हैं। इस वक्त तो लगभग पूरा देश उनके गुणगान में लगा हुआ है कि उन्होंने इतने लाख लोगों को बचा लिया। क्या नेता, क्या पत्रकार और क्या आम जनता, फेसबुक और ट्विटर पर सैनिकों की लोगों को बाढ़ से निकालते हुए कई तस्वीरें शेयर कर रहे हैं।

सैनिकों का अभूतपूर्व स्तुतिगान हो रहा है। मगर यह सब जम्मू-कश्मीर की स्थिति सुधरने तक ही है। क्योंकि इसी जम्मू-कश्मीर में जब बाढ़ की आपदा नहीं थी, आए दिन हमारे सैनिक शहीद होते रहे हैं, मगर उन्हें याद करने की फुर्सत किसी के पास नहीं दिखी। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को एक्शन और सनसनी चाहिए, जो उन्हें किसी एक अकेले सैनिक के सीमा पर शहीद होने की खबर में शायद नहीं मिलती। प्रिंट मीडिया के लिए भी वह कभी मुखपृष्ठ पर छापने जितनी अहम नहीं हो पाती। jammu-floodsसवाल सिर्फ मीडिया तक ही सीमित नहीं, सैनिकों का समाज में भी रुतबा लगातार कम हुआ है और इसकी एक वजह यह है कि यहां हर चीज को राजनीतिक लाभ-नुकसान के नजरिए से देखा जाता हे।

दिल्ली में न जाने कितने सालों से भूतपूर्व सैनिक वन रैंक वन पैंशन को लेकर लड़ रहे थे, मगर उन्हें आश्वासनों के सिवा कुछ न मिला। यह तो लोकसभा चुनाव में उनके वोट पाने के लिए उन्हें खुश करने की कोशिश के चलते यूपीए ने आखिरकार उनकी मांग स्वीकार की। एनडीए की मौजूदा सरकार भी सेना और सैनिकों के बारे में बड़ी-बड़ी बातें करने में पीछे नहीं, मगर जमीनी हकीकत कुछ और है। भूतपूर्व सैनिकों को नाकों पर टोल देने से छूट मिली हुई थी, जिसे पिछले ही दिनों वापस ले लिया गया है। ऐसे सैनिकों की कमी नहीं, जो शहीद हो गए, मगर आज भी उनके परिवार जायज पेंशन पाने के लिए सरकारी दफ्तरों में भटक रहे हैं।

सेना में न जाने कितने सालों से अफसरों की कमी है। दस साल पहले यह आंकड़ा करीब 14 हजार था और आज भी वह उतना ही है। जाहिर है, इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। हाल यह है कि नौकरी को लेकर नौजवानों के लिए सेना अब पहला विकल्प नहीं रहा, जैसा कि पहले रहा करता था। बल्कि उन्हें आकर्षित करने के लिए अब सेना लुभावने विज्ञापन भी देती है। सेना में अफसरों की कमी का नतीजा है कि उन्हें बहुत तनाव में काम करना पड़ता है। यह तनाव कई मर्तबा उनके जवानों के प्रति खराब बर्ताव के रूप में बाहर फूटता है और हमें जवानों द्वारा अफसरों पर गोली चला देने जैसी खबरें सुनने को मिलती हैं। खुद जवानों को कई तरह के दबावों और तनावों में काम करना पड़ता है। नौजवान अगर सेना की ओर रुख नहीं कर रहे, तो इसकी एक वजह उस सामाजिक रुतबे में लगातार आने वाली कमी है, जो कभी सेना के अफसरों के साथ जुड़ा हुआ था।

फील्ड मार्शल मानिक शॉ जैसे कमांडर अगर अब देखने को नहीं मिलते, तो इसकी वजह यह है कि अब सेना के शीर्ष कमांडरों को हर बात पर अपने राजनीतिक आकाओं के समक्ष झुकना पड़ता है। ब्यूरोक्रेसी ने भी जहां मौका मिला, वहां उसने सेना के कमांडरों की ताकत कम करने की कोशिश की है। नतीजतन सेना के अधिकारियों को आत्मसम्मान के मामले में जब-तब समझौते करने पड़े हैं। मगर इस सबके बावजूद युद्ध और अपदाओं में उन्होंने जिस तरह जोखिम उठाकर अपने कर्तव्यों का निर्वाह किया है, उसकी तुलना नहीं की जा सकती। उन्होंने करगिल की लगभग असंभव लड़ाई जीती। मुंबई में 26/11 के हमले में, जब पूरा देश आक्रांत था, सेना के कमांडोज ने ही जान पर खेलकर आतंकवादियों से छुटकारा दिलवाया था।

हमारे सैनिकों को सियाचिन में जिन स्थितियों में रहना पड़ता है, उसकी कल्पना नहीं की जा सकती। लेकिन उन्हें बदले में ऐसा कुछ नहीं मिलता, जिस पर वह फख्र कर सकें। एक सिपाही को चालीस-बयालीस साल की उम्र में ही रिटायर होना पड़ता है। यह तो कोई रिटायरमेंट की उम्र नहीं। और ऐसा क्यों हो कि हम सिर्फ शहीद होने पर ही उन्हें याद करें। उनका सैनिक जीवन ही इतना तकलीफदेह और जोखिम भरा होता है कि सिर्फ सैनिक होना ही उन्हें सलाम करने को बहुत होना चाहिए, मगर जब तक प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री, ब्यूरोक्रेसी, मीडिया और आम जनता उनके त्याग-बलिदान की इज्जत करना नहीं सीखती, उनकी स्थिति में ज्यादा सुधार आने की गुंजाइश नहीं।

(सुंदर चंद ठाकुर की फेसबुक वॉल से साभार)

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