आधुनिक भारतीय समाज में स्त्री का अस्तित्व


सुश्री वसुंधरा राय

भारत एक ऐसा देश है जहां आज भी महिला की सामाजिक,पारवारिक, राजनैतिक, मनोवैज्ञानिक व मानसिक शैक्षणिक एवं सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक स्थिति अन्य देशो से तुलनात्मक बहुत कमज़ोर है।
भारतीय समाज में आज भी संस्कारों का हवाला देते हुए महिलाओं को रात में घर से निकलने की इज़ाज़त नही मिलती । इसी कारण अधिकांश भारतीय महिला पढ़े लिखे परिवार की बहु और बेटी बनकर गर्वांवित होने तक ही सीमित रह जाती हैं । योग्य होते हुए महिलाओं को घर के कामो के अलावा नौकरी करने की इजाज़त नहीं देते।

भारतीय महिलाओं की स्थिति कभी एक समान नहीं रही है, एक समान स्थिति का रह पाना संभव भी नहीं , इसमे भी कोई दो राय नहीं कि महिलाओ ने पुरूष प्रधान समाज मे तमाम चुनौतियों को स्वीकारा है और विजय भी प्राप्त की है। देश के सर्वोच्च पद पर पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी जीवंत उदाहरण हैं , देश के तमाम राज्यों की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी , वसुंधरा राजे, मायावती, शीला दीक्षित, स्व० जय ललिता जी , भारत की रक्षामंत्री सुषमा स्वराज , कॉंग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी पूर्व पी. एम इंदिरा गाँधी जी ने देश की राजनीति को नया आयाम दिया । समाजिक क्षेत्र मे किरण मजूमदार, मेधा पाटकर, सुधा मूर्ति किरण वेदी जैसी सशक्त महिलाओं ने अपने अस्तित्व का परचम लहराया । पी.टी. ऊषा, सानिया मिर्ज़ा साइना नेहवाल ने देश को गर्वांवित किया है , ऐषवर्या राय सुष्मिता सेन प्रियंका चोपड़ा ऐसे नाम हैं भारत जिन पर गर्व करता है लेकिन ऐसी कितनी महिलाएं हैं जो अभी तक अपने वजूद के लिए संघर्ष कर रहीं हैं ।
पुरानी रूढ़ीवादिता एवं अञान यदि कम हुआ भी है तो कितना ये समझना होगा ।
महिलाओ की स्थिति यदि बैंक एकाऊंट सेल फोन स्कूली शिक्षा तथा आधुनिक परिधानों मे लिपटा तन विकास की परिभाषा है तो एक बार अवश्य विचार करना होगा कि हम व हमारे विचार कहां है और कब तक ऐसे ही भ्रमित रहेंगे ?

एक सर्वेक्षण के अनुसार 50% महिलाएं नौकरी करना चाहती हैं लेकिन अधिकांत: महिलाओं को लिंगभेद जैसी भारतीय समाज की कड़वी सच्चाई को ज़हर की तरह पीना पड़ता है । एन एस एस ओ रिपोर्ट के अनुसार शहर हो या गांव देश में कामकाजी लोगों में महिलाओं का अनुपात पुरूषों के मुकाबले बहुत कम है उदाहरण के तौर पर 1000 पुरूषों की तुलना मे मात्र 214 महिलाएं ही कामकाजी हैं जो अपने आप में बडा प्रश्नचिन्ह की ओर इंगित करता है कि ऐसा क्यों और कब तक ?
श्रमशक्ति में भारतीय महिला नेपाल बांगलादेश श्रीलंका पाकिस्तान से पीछे है जो अपनेआप में विचारणीय व चिंतनीय है । एक उदाहरण इराक का दिया जा सकता है जो मुस्लिम देश होते हुए भी ‘विकास’ में बहुत आगे है। क्योंकि वहां महिलाएं जीवन के किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं है। ऐसे देशों में महिला-पुरुष का भेद कम होने के कारण उनका विकास में योगदान गौण न रहकर समान हो जाता है। इसमें कोई शंका नहीं है कि महिला सशक्तिकरण की दिशा में देश प्रगति पर है किंतु अभी भी ऐसे कई क्षेत्र हैं जहां और अधिक प्रयासों की आवश्यकता है ।
जैसे पिछले पांच वर्षों में जन्म के समय लिंग अनुपात मामूली रूप से सुधर कर प्रति 1000 लड़कों पर 914 लड़कियों से बढ़ कर मात्र 919 तक ही पहुंचा है , हरियाणा लिंग अनुपात 836 जबकी पड़ोसी पंजाब में 860 है , मध्यप्रदेश में यह अनुपात 960 से गिरकर 927 है ।
महिलाओं की प्रगति के दृष्टिकोण से यदि देखा जाए तो दादरा नगर हवेली में कन्या अनुपात सबसे अधिक 1013 तक पहुंच गया है ।
ये स्वयं में हास्यास्पद व विरोधाभास जैसी स्थिति है कि एक तरफ हम महिलाओं के उत्थान की बात करते है तो दूसरी तरफ कोख में यदि कन्या भ्रू्ण है तो उसे जन्म लेने का अधिकार भी छीन लेते हैं ।
पुरानी रूढीवादिता व अञानता से कुछ हद तक तो छुटकारा मिला है लेकिन ये भी कितने प्रतिशत मिला है जांचना आवश्यक है ।
यदि हम वास्तव में महिलाओं का सशक्तिकरण चाहते हैं तो दिखावे के स्थान पर क्रियान्वयन की तरफ बढ़ना होगा। ऐसा हमारे देश मेें ही संभव है कि पिता की संपत्ति में लडक़ा-लडक़ी की समान भागीदारी का कानून होने के बावजूद किसी ‘महानायक’ की ऐसी घोषणा मीडिया में सुर्खिया बनती हैं। क़ानूनी तौर पर तो पुत्री भी पिता की जायजाद में पुत्रों के बराबर ही हिस्सेदारी रखती है लेकिन प्रयोगात्मक रूप में कितने सफल है यह समझना होगा।

वर्तमान स्थिति अनुसार भारतीय सरकार द्वारा महिलाओं के उत्थान के अनेक जागरूक कार्यक्रम कर रही है किंतु इन कार्यक्रमों का सही तरह से ज़रूरतमंद महिलाओं तक ना पहुँच पाना सरकार के प्रयासों पर स्वत: प्रश्न खड़ा करती हैं व विचार करने की आवश्यकता है कि चूक कहां और किनसे हो रही है?

पं० जवाहरलाल नहेरू जी ने कभी किसी मंच से अपने भाषण में कहा था, “यदि आपको अपना विकास करना है तो महिलाओं का विकास करना होगा , उन्हे प्रगतिमार्ग पर बिना रोक टोक के स्वयं फैसले लेने की आज़ादी देनी होगी , जहां महिलाओं का विकास वहां समाज का विकास स्वयं होता जाएगा।”

आने वाले समय में सबसे बड़ा परिवर्तन संकीर्ण मानसिकता से मुक्ति पाना होगा । समयानुसार हर परिस्थितियों में भारतीय महिला अपनी उड़ान भर कर अपने हिस्से में आसमान को अपनी तरफ झुका लेने की शक्ति रखती है । बात बस एक अवसर की है । स्त्री के कदमो तले स्वर्ग है उसका मन कोमलता शीतलता से भरा हुआ है जिसमें मामत्व वात्सल्य पवित्रता जैसे अनेक उत्कृष्ट गुणों का समावेश है जिसे सम्मान देने और निर्णय लेने की स्वतंत्रता देनी ही होगी ।

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