फन फैलाते आतंकवाद के प्रति ‘जीरो’ टॉलरेन्स


डा. विनोद बब्बर

आतंकवाद का जहर दिन -प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। यूरोप के अनेक देशों में विध्वंसक उपस्थिति दर्ज कराने के बाद अब ब्रिटेन के उत्तरी शहर मैनचेस्टर में अमेरिकी गायिका एरियाना ग्रैंडे के एक कार्यक्रम के बाद हुए आत्मघाती बम विस्फोट में कुछ बच्चों समेत 22 लोग मारे गए जबकि 59 अन्य घायल हो गए। इस आत्मघाती बम धमाके की जिम्मेदारी आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट ने ली है। ब्रिटिश खुफिया सूत्रों ने ऐसी और घटनाओं की चेतावनी देते हुए सतर्क रहने को कहा है। आश्चर्य यह है कि सारी दुनिया पर राज करने वाले अंग्रेज एक दशक पूर्व अपने ही ब्रिटिश फ़ील्ड मार्शल की आतंकवाद विषयक उस चेतावनी को अनदेखा करने की सजा भुगत रहे हैं जिसमें कहा गया था कि ‘यह लड़ाई हमारी गलियों तक आये, उससे पहले हमें इसे उसके मूल में जाकर ख़त्म करना होगा।’ इसे आश्चर्य कहे या आत्मघाती मूख्रता, पश्चिम को आतंकवाद के मूल का अभी तक पता नहीं चला है जबकि ब्रिटेन के बर्मिंघम या मैन्चेस्टर की गलियों में धार्मिक कट्टरता स्पष्ट देखी जा सकती है। आधुनिकता ओर फैशन की धरती पर पांच सात साल की बच्चियों तक को काले हिजाब ओढ़े हुए तो लम्बा चोगा पहने पाकिस्तानी दिखते हैं। ऐसे में प्रश्न यह है कि क्या अब ब्रिटेन भी तुष्टीकरण के मार्ग पर है?
दुखद आश्चर्य यह है कि ब्रिटेन सहित पूरा पश्चिम आतंकवाद पर अस्पष्ट रवैया अपना रहा है। सस्ती मजदूरी के लालच में यूरोप ने अपने नियम कानूनों को लचीला बनाया तो दूसरी ओर गृहयुद्ध के शिकार अनेक देशों के शरणार्थियों के लिए अपने द्वार खोले। ऐसे में इस्लामी जगत से आए लोग बड़ी संख्या में इन देशों में बस गए। उन लोगों की प्रथम पीढ़ी ही नहीं, बाद वाली जनरेशन भी स्थानीय समाज सेें घुलने-मिलने को अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान के लिए खतरा मानती हैं। ऐसे में उनकी शिक्षा आधुनिक न होकर परम्परागत ही रहती है वहीं वे अलग- थलग रहने के कारण अलगाववादी विचारों के सहज बंदी हो जाते हैं।
अलगाववाद और आतंकवाद के विषय में विशेष बात यह भी है कि एक ओर सऊदी अरब आईएस आईएस विरोधी अमेरिकी अभियान का महत्वपूर्ण सांझीदार माना जाता है, दूसरी ओर वही सऊदी अरब सारी दुनिया में जिहाद की पढ़ाई कराने वाले मदरसों को आर्थिक सहयोग भी देता है। आश्चर्य कि विश्व उसके इस दोहरे व्यवहार को समझकर भी नहीं समझ रहा।
कुछ लोग बेरोजगारी या नस्ली भेदभाव जैसी मनमानी व्याख्याएं करके आतंकवाद को उचित ठहराते हैं लेकिन वे यह भूलते हैं कि ंएशिया -अफ्रीका के अनेक गैरमुस्लिम देशों में भी बेरोज़गारी, अवसरों का अभाव और सामाजिक भेदभाव कम नहीं है, परंतु वहां कहीं भी वैसा आतंकवाद नहीं है। कुछ लोग अशिक्षा अथवा अल्पशिक्षा को आतंकवाद से जोड़ते हैं। लेकिन अमेरिका की ट्विन टावर घटना क्या अशिक्षा अथवा अल्पशिक्षा वालों का अपराध है? भारत के कुछ बुद्धिहीन बुद्धिजीवियों सहित दुनिया में एक ऐसी विचारधारा भी है जो उन आतंकवादियों से बातचीत की पक्षधर है जो केवल अपनी विचार धारा, अपनी आस्था, अपनी जिद्द को सही मनवाने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तत्पर है। अतः बातचीत के विचार को हमेशा के लिए दफन कर देना चाहिए और शठे शाठ्यम समाचरेत यानी जस को तस’ की नीति का सख्ती से पालन ही एकमात्र विकल्प है। यहां यह भी समझना जरूरी है कि जो निर्दोषों यानी मानवता की हत्या करते हो उनके मानवाधिकार की बात करने वाले भी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से आतंकवाद को बल ही प्रदान कर रहे हैं।
समय की मांग है कि सभी को निष्पक्षता से विचार करना होगा कि आतंकवाद का असली मूल कहां हैं? यह विचारणीय है कि क्या आतंक वहाबियों विचारधारा से कोई संबंध है जिसका निर्यातक सउदी अरब है? क्या सारी दुनिया को एक धार्मिक विचार और परचम के तले लाने की जिद्द का आतंकवाद से कोई संबंध हो सकता है? पाकिस्तान में सुरक्षित रह रहे आतंकी सरगनाओं के विरूद्ध कार्यवाही करना तो दूर उन्हें आतंकी मानने तक से बचने वाले देशों को अपने दोहरे आचरण का त्याग कर यह सूर्य के प्रकाश की तरह स्पष्ट दिख रहे सत्य को स्वीकार करना ही चाहिए वरना आतंकवाद आज एक देश को तो कल दूसरे देश और समाज को अपना ग्रास बनाने से नहीं चूकेगा।
दुनिया का हर शांतिप्रिय नागरिक जानता है कि आतंकवाद से किसी का भला होने वाला नहीं है। क्षणिक संतुष्टि प्राप्त करने वाले समाज को दीर्घकाल तक क्षति उठानी पड़ती है। मुट्ठीभर राक्षसों के कारण अगर किसी सम्पूर्ण समुदाय पर आरोप आता है तो उसे न्योचित नहीं ठहराया जा सकता परंतु यह उस समुदाय की भी जिम्मेवारी है कि वह अपने धार्मिक, बौद्धिक प्रवक्ताओं के माध्यम से आतंकवाद और उसका समर्थन करने वालों को ‘अधार्मिक’ घोषित करें। अगर किसी धार्मिक ग्रन्थ में कुछ ऐसा है जो समय, काल, परिस्थिति के अनुसार भेदभाव पूर्ण है तो उसे हटाने अथवा बदलने से भी संकोच नहीं होना चाहिए। क्योंकि आतंकवाद को धर्मयुद्ध (जेहाद) कहना मानवीय अपराध है। इस राह पर चलकर यदि कोई धर्मराज स्थापित करने का दावा करता है तो उसे बिना देरी किये नष्ट किया जाना चाहिए। इस कार्य में जरा सी चूक आत्मघाती साबित हो सकती है। अमेरिका का उदाहरण हमारे सामने है। अफगानिस्तान से रूस की सेनाओं से लड़ने के लिए जिन तालिबानों को उसने मदद दी बाद में वे ही उसी के लिए समस्या बन गए तो अमेरिका को उसे नष्ट करने के लिए अपनी सेनाएं भेजनी पड़ी। अमेरिका की वह भूल न केवल उसे बल्कि सारे विश्व को महंगी पड़ रही है। इसी प्रकार फ्रांस की लापरवाही पेरिस सहित अन्य यूरोपीय देशों पर बार-बार आतंकी हमलों का कारण बन रही है। इस वास्तविकता से मुंह चुराना आत्मघाती होगा कि आतंकवाद एक वैश्विक समस्या है। यूरोप, अमेरिका, एशिया, अफ्रीका, हर जगह आतंक का आतंक अपना फन फैला रहा है। आईएसआई के गुर्गे लगातार रक्तपात कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ सहित कोई भी विश्व संगठन आजतक आतंकवाद की एक सर्वसम्मत परिभाषा भी तय नहीं कर सका है। शायद ऐसा करना बड़े देशों की उस कूटनीति में बाधा बन सकता है जिसका बड़े देश रणनीतिक उपयोग करते हैं।
जहां तक भारत का प्रश्न है, हम स्वयं आतंकवाद से पीड़ित हैं। भारत को आतंक निर्यात करने वाले पाकिस्तान से अमेरिका के दबाव में बातचीत करना समय की बर्बादी है। उससे संबंध सुधारने, मोमबत्तियां जलाने या आम के टोकरे कबूलने अथवा भेजने में अपनी ऊर्जा बर्बाद करने की बजाय हमें अपनी सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने पर बल देना चाहिए। क्योंकि आतंकवादी उड़कर नहीं आए थे। हमारी अपनी व्यवस्था में हुई चूक के लिए किसी दूसरों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। आतंकवाद को साफ करने के लिये राजनीति की सफाई भी जरूरी है। यदि देशद्रोहियों पर नकेल न कसी गई तो ये जहरीले नाग इस देश के अमन चैन को डस लेंगे।
आतंकवाद के प्रति सहिष्णुता (टालरेन्स) शून्य प्रतिशत होनी चाहिए लेकिन भारत में मीडिया विशेष रूप से इलैक्ट्रोनिक मीडिया दोषियों के पक्ष में अनावश्यक माहौल बनाने का काम करता है। आतंक से जुड़े किसी भी व्यक्ति को महिमा मंडित करने वालों पर भी नकेल कसने की आवश्यकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मनमानी नहीं हो सकती। स्वतंत्रता के साथ कुछ जिम्मेवारियां है तो उसकी सीमाएं भी है। सीमाओं का अतिक्रमण सदैव विनाशकारी होता है। सुरक्षा बलों के पास जम्मू कश्मीर सहित पूरे देश में सिर उठाने वाले हर देशद्रोही का फन कुचलने के स्थायी आदेश होने चाहिए। ऐसे तत्वों को देखते ही गोली मारने के अतिरिक्त शांति का कोई दूसरा रास्ता नहीं है। इस संबंध में महाभारत के शांतिपर्व में दिये पितामह भीष्म के कथन, ‘शांति के लिए कोई भी कीमत कम नहीं है। लेकिन जहां राष्ट्र की अस्मिता और स्वाभिमान का प्रश्न हो तो हजार युद्ध भी स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए’ को स्मरण रखा जाये। ब्रिटेन सहित कहीं भी आतंकवाद के कारण होने वाली हर मौत मानवता की हत्या है। मानवता को बचाने के लिए अमानवों को नष्ट करने के लिए सभी को एकजुट होना ही होगा वरना कल मृतकों की सूची में आपका हमारा नाम भी हो सकता है।

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