असहिष्णुता का हौवा


बलबीर पुंज

6पिछले कुछ समय से असहिष्णुता को लेकर मचाया गया प्रलाप अंतत: संसद तक पहुंच गया। सदन में संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव अंबेडकर और संविधान पर चली दो दिनी चर्चा में विपक्षी दलों की बहस सुनकर तो लगता है कि देश में कथित असहिष्णुता का जो माहौल बना है, उसे बनाने में कहीं न कहीं भाजपा का सत्ता में आना और नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना जिम्मेदार है। उन्होंने और संघ परिवार ने ऐसा वातावरण बना दिया कि देश में असहिष्णुता और बहुत सारे तबकों में असुरक्षा की भावना पैदा हो गई।

संसद में सेक्युलरवाद को लेकर बहस चली। क्या संविधान बनने के 25 साल बाद संविधान में ‘सेक्युलर’ शब्द जोड़ने से पूर्व भारत पंथनिरपेक्ष नहीं था? भारत के संविधान में सेक्युलर शब्द जोड़ने या संविधान के किसी प्रावधान के कारण देश पंथनिरपेक्ष नहीं है। देश पंथनिरपेक्ष है तो इसका श्रेय यहां की बहुलतावादी सनातन संस्कृति को जाता है, जो ‘एकं सद् विप्रा: बहुधा वदंति’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की सहिष्णु मान्यता से ओतप्रोत है। यदि ऐसा नहीं होता तो देश के रक्तरंजित विभाजन के बाद जब पाकिस्तान ने खुद को इस्लामी राष्ट्र के रूप में स्थापित कर लिया तो बहुत स्वाभाविक होता कि भारत भी एक हिंदू राष्ट्र के रूप में घोषित कर लेता।1

आज सेक्युलरवाद कट्टरपंथ के पोषण और हिंदू, हिंदू संस्कृति और उसकी मान्यताओं के प्रति तिरस्कार भाव का पर्याय बन गया है। अन्यथा क्या कारण है कि किसी सार्वजनिक समारोह में दीप प्रज्ज्वलन या किसी योजना या भवन के उद्घाटन पर नारियल फोड़े जाने को सांप्रदायिक ठहराया जाता है? क्यों राष्ट्रगान या वंदे मातरम् कहने में सांप्रदायिकता का प्रश्न खड़ा किया जाता है?

देश में फैली कथित असहिष्णुता को लेकर पिछले दिनों फिल्म जगत के शाहरुख खान और आमिर खान के बयान आए। इस कड़ी में आमिर खान ने जो कहा वह तो असहिष्णुता के नाम पर खड़े किए जा रहे हौवे की पराकाष्ठा है। आमिर खान के दो बयान आए। पहले उन्होंने कहा था, ‘देश में असुरक्षा का भाव है। मेरी पत्नी अखबार खोलते हुए डरती है। उसने मुझसे पूछा कि क्या हम यह देश छोड़कर कहीं और नहीं जा सकते?’ उसके दूसरे दिन उन्होंने कहा कि उन्हें देश पर गर्व है।5

किंतु मैं अपने पहले के बयान के एक-एक शब्द पर कायम हूं। आमिर खान उस देश पर कैसे गर्व कर सकते हैं, जिसमें उनकी पत्नी और बच्चे इतने असुरक्षित हैं? आमिर खान पब्लिक पर्सनालिटी हैं, इसलिए उन्हें दो टूक बताना होगा कि वे पहले दिन सच बोल रहे थे या दूसरे दिन झूठ बोल रहे दोनों बयानों में अंतरविरोध है, सुधी पाठक निष्कर्ष निकाल सकते हैं। अभी केरल की एक महिला पत्रकार ने फेसबुक पर इसका खुलासा किया कि मदरसों में मौलवी बच्चों का यौन शोषण करते हैं। उसका फेसबुक खाता बंद किया गया और अब उसे जान से मारने की धमकी मिल रही है। कुछ समय पूर्व केरल में एक ईसाई प्रोफेसर का हाथ जिहादियों ने बर्बरतापूर्वक काट डाला था, क्योंकि उसने प्रश्नपत्र पर पैगंबर साहब पर भी एक प्रश्न सेट करने का दुस्साहस किया था।

दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में एक हिंदू लड़के को अपने छात्रवास के कमरे में अपने जन्मदिन पर पूजा कराने के कारण वार्डन की प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा। रमजान के दिनों में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रवास में रहने वाले गैर मुस्लिम छात्रों के खानपान पर समय की पाबंदी लग जाती है।

पश्चिम बंगाल के मटियाबुर्ज में मदरसा चलाने वाले काजी मासूम अख्तर ने अपने छात्रों से प्रतिदिन क्लास प्रारंभ होने से पूर्व राष्ट्रगान गाने को कहा था। विगत अप्रैल माह में कट्टरपंथियों ने उन पर जान लेवा हमला किया था। पुलिस ने सुरक्षा देने से मना कर दिया। भय से वे अब तक मदरसा नहीं जा पा रहे। तस्लीमा नसरीन को देश में शरण न देना, रातोरात उन्हें पश्चिम बंगाल से बोरियाबिस्तरा बांध तड़ी पार कराने में कौन सी सहिष्णुता थी? खान बंधुओं को ऐसे मामलों में असहिष्णुता क्यों नहीं दिखती?

असुरक्षा क्या होती है, यह उन हिंदुओं से पूछना चाहिए जिन्होंने मुसलमान सुल्तानों और मुगल बादशाह औरंगजेब से लेकर टीपू सुल्तान तक का बर्बर राज देखा है। उन हिंदुओं से पूछिए, जो देश के रक्तरंजित विभाजन के बाद पाकिस्तान में रह गए थे। तब वहां हिंदू-सिखों की आबादी 24 प्रतिशत थी। आज उनकी आबादी एक प्रतिशत से भी कम है। बांग्लादेश जब बना तब वहां हिंदू-सिखों की आबादी 30 प्रतिशत के करीब थी। अब उनकी संख्या 7 से 8 प्रतिशत के बीच है।

बाकी कहां गए? मजहबी कट्टरता के कारण वे वहां न तो अपनी पहचान बचा पाए और न ही अपने आप को। उन कश्मीरी पंडितों से पूछिए, जिनकी नब्बे के दशक से पूर्व घाटी में करीब पांच लाख आबादी थी। आज वे अपने ही देश के अन्य हिस्सों में शरणार्थियों की तरह दोयम दर्जे की जिंदगी जीने को अभिषप्त हैं। सन् 1993 और 2008 में मुंबई की सड़कें निरपराधों की लाशों से लाल हुईं। आमिर खान और उनकी पत्नी को तब असुरक्षा का माहौल क्यों नहीं नजर आया? अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों को लोकतंत्र और सहिष्णुता का पर्याय माना जाता है। नागरिक अधिकारों के मामले में उन्हें आदर्श बताया जाता है।

फिर उन पर आतंकी हमला करने वाले किससे प्रेरित हैं, सेक्युलरिस्ट इसका जवाब दें। इस प्रश्न का उत्तर लंदन में 2005 में हुए हमले के बाद कराए गए एक सर्वे में निहित है। उक्त सर्वे में 45 प्रतिशत मुसलमानों ने अमेरिका में 11 सितंबर के आतंकी हमले को अमेरिका व इजरायल की साजिष बताया था। लंदन के हमले को चार में से एक ने उचित बताया। जब उनसे पूछा गया कि क्या ब्रिटेन उनका देश है तो चार में से एक ने ही हां कहा।
435 प्रतिशत

मुसलमान ब्रिटिश कानून की जगह शरीआ कानून के अंतर्गत रहना चाहते हैं। 75 प्रतिशत ने पैगंबर साहब के काटरून बनाने वालों को कठोरतम सजा देने और बहुतों ने मौत की सजा की मांग की। यह है कट्टरपंथी इस्लामी मानस। सेक्युलरिस्ट पैगंबर साहब का कारटून बनाने वालों के खिलाफ संसद में निंदा प्रस्ताव तो पारित करते हैं, किंतु हिंदू देवी-देवताओं का नग्न चित्रण करने वाले एमएफ हुसैन के मामले में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न खड़ा करते हैं।यही सेक्युलरवाद है?

आमिर खान से पूछना चाहिए कि दुनिया में कौन सा देश सहिष्णुता की प्रतिमूर्ति है, जहां वे परिवार समेत पूर्ण सुरक्षा के माहौल में बसना चाहेंगे? दुनिया में मजहब के नाम पर जो जहर फैला है, वह सही मायनों में असहिष्णुता का पर्याय है। प्रश्न यह भी है कि जहां मुस्लिम बहुसंख्या में है वहां भी आपस में मारकाट क्यों मची है? आतंकवाद के कारणों का विश्लेषण करने वाले विशेषज्ञों के अनुसार आतंकवाद प्रताड़ित किए जाने के सही या काल्पनिक भय, असुरक्षा के भाव, किसी करिश्माई व्यक्तित्व से मुक्ति मिलने की चाह और वैचारिक विष से जनित है। खान बंधुओं का अपना व्यक्तित्व है, किंतु अपनी छवि का बेजा उपयोग कर क्या वे समाज के एक वर्ग में काल्पनिक भय का हौवा नहीं खड़ा कर रहे?

लेखक प्रख्यात पत्रकार एवं भाजपा के पूर्व सांसद हैं।

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