अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर


-डॉ. अंजनी झा

index1अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुप्रीम कोर्ट ने भी कायम रखा | साइबर कानून के उस प्रावधान को कोर्ट ने निरस्त कर दिया जो वेबसाईटों पर कथित अपमानजनक सामग्री डालने पर पुलिस किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने की शक्ति देता था | न्यामूर्ति जे.चलमेश्वर और न्यायमूर्ति आर.एफ. नरीमन की पीठ ने कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धरा ६६ए से लोगों के जानने का अधिकार सीधे तौर पर प्रभावित होता है |
इस प्रावधान को असंवैधानिक ठहराने का आधार बताते हुए अदालत ने कहा कि प्रावधान में इस्तेमाल, चिढ़ानेवाला, बेहद अपमानजनक जैसे शब्द अस्पष्ट है, क्योंकि कानून प्रवर्तन एजेंसी और अपराधी के लिए अपराध के तत्वों को जानना कठिन है | पीठ ने कहा है कि एक ही सामग्री को देखने के बाद न्यायिक तौर पर प्रशिक्षित मस्तिष्क अलग-अलग निष्कर्षों पर पहुँच सकता है तो कानून लागु करने वालि एजेंसियों और दूसरों के लिए इस बात पर फैसला करना कितना कठिन होगा कि क्या अपमानजनक है और क्या बेहद अपमानजनक है | कोई भी चीज किसी एक व्यक्ति के लिए अपमानजनक हो सकती है तो दूसरों के लिए हो सकता है कि वह अपमानजनक नहीं हो | पीठ ने कहा कि सरकारें आती और जाती रहती हैं लेकिन धारा ६६ए सदा बनी रहती रहेगी | प्रताड़ित करने और गिरफ्तारी की कई शिकायतों के मद्देनजर 16 मई २०१३ को शीर्ष अदालत ने एक परामर्श जारी किया था जिसमें कहा गया था कि सोशल नेटवर्किंग साइटों पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ पोस्ट करने के आरोपी किसी भी व्यक्ति को पुलिस आई.जी. या डी.एस.पी. जैसे वरिष्ठ अधिकारीयों से अनुमति हासिल किये बिना गिरफ्तारी नहीं कर सकती |

उल्लेखनीय है कि यह कानून इंटरनेट और सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अंकुश लगाने का जरिया बन गया था | ऐसे अनेक मामले प्रकाश में आये जिसमें कानून को ढाल बनाकर अनेक गिरफ्तारीयां हुईं | कानून का दुरूपयोग हुआ | सोशल मीडिया के लगातार बढ़ते प्रयोग के कारण कई उटपटांग, नकारात्मक, अनर्गल पोस्ट होते रहते हैं | हालाँकि, इस खुलेपन के कई नकारात्मक असर भी होते हैं | किन्तु केवल इसी को केन्द्र में रखकर अभिव्यक्ति का गला घोंटना अमानवीय है | आईटी अधिनियम वर्ष 2000 में बना | वर्ष 2008 में इसमें कई सुधार, संशोधन किये गये | delhi-Shreya-Singhal-cyber-IT-Act-Section-66A-Cancel-Facebook-Comment-Social-Media-Supreme-Court-Public-interest-litigation-filed-news-in-hindi-india-88493संविधान की धारा 19(1) के तहत हर नागरिक को अभिव्यक्ति का अधिकार हासिल है | भाजपा ने धारा ६६ए की जमकर मुखालपत की थी, किन्तु सत्ता में आते ही वह इस धारा के बचाव में खडी हो गई | राज्यसभा में मई 2012 में अरुण जेटली ने कहा था कि वह धार्मिक उन्माद फैलाने को लेकर इंटरनेट के दुरूपयोग को रोकने के लिए लाए गये दिशा-निर्देश से सहमत हैं, लेकिन उन्होंने कुछ आशंकाएं भी जताई थी |
इस फैसले से खासतौर पर शाहीन खुश है | फारुख की बेटी शाहीन ने 18 नवम्बर 2012 को बाल ठाकरे के निधन के बाद मुंबई बंद के आव्हान पर सवाल करने वाली पोस्ट फेसबुक पर डाला था | पोस्ट में इस बात पर सवाल उठाया गया था कि रोजाना हजारों लोगों का निधन है, पर दुनिया रूकती नहीं | सिर्फ एक नेता के निधन पर फिर ‘बंद’ क्यों ? इस ‘बंद’ को पोस्ट में स्वैच्छिक के बजाय बलपूर्वक करवाया गया बंद कहा गया था | तोड़-फोड़ की गई |उसे अघोषित नज़रबंद के रूप में रहना पड़ा | इस घुटन ने अभ्व्यक्ति के मुद्दे को हवा दी |
मानसिक संत्रास झेल चुकी रेणु भी खुश है | उसकी गलती केवल यही थी कि शाहीन की पोस्ट को लाइक किया था | डाक्यूमेंट्री इंडियाज डाउटर पर प्रतिबन्ध के बाद यह निर्णय प्रजातंत्र के साथ स्वतंत्र न्यायपालिका की ओर गहरी प्रतिबद्धता को दोहराता है |

प्रसिद्ध कानूनविद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सुप्रीमकोर्ट में अपने ऊपर लगे मानहानि मुकद्दमों के चलते विशेषकर जयललिता द्वारा दायर किये केस में धारा 499 तथा 500 की संवैधानिकता को चुनौती दी है | उन्होंने सुप्रीमकोर्ट को बताया कि 70 से अधिक देशों में यह धाराएँ समाप्त हो गई है | किसी पर आरोप लगाना अथवा टिप्पणी करना आपराधिक कृत्य में नहीं आता है सो इसके तहत आपराधिक मामला नहीं बनता है | सुप्रीमकोर्ट ने इन धाराओं पर केन्द्र सरकार से अपना पक्ष रखने को कहा है | विधि मंत्रालय और उससे जुड़ें महकमे सुप्रीमकोर्ट को जबाब देने में जुट गए है | डॉ. स्वामी एवं अरुण जेटली की इस मुद्दे पर मुलाकात से कयास लगाए जा रहे है कि केन्द्र सरकार का रुख सकारात्मक ही होगा | ऐसा हुआ तो सही मायने में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का “राष्टीय-दिवस” बन जायेगा |

राज्य की संप्रभुता, उसकी प्रतिष्ठा और राजनेताओं के निजी सम्मान में फ़र्क करना आवश्यक है | समाज में तकनीकी और शिक्षा के विकास के कारण साइबर स्पेस के साथ खुली आज़ादी पश्चिमी देशों की भांति लाजमी है | हमें अभिव्यक्ति की इच्छा का सम्मान करते हुए अपनी संप्रभुता, सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत और विभिन्न समुदायों की गरिमा की रक्षा भी करनी है | हमें साइबर दुनिया को नियंत्रित करने की नियत से नहीं, बल्कि उसे अराजक होने से रोकने के लिये सिस्टम तैयार करना होगा | इस फैसले ने पुलिस को मिली अतिरिक्त शक्ति छीनी है | इन्हीं प्रावधानों में से एक है आई.पी.सी. की धारा 295ए जिसमे स्पष्ट है कि लिखने, बोलने, और दृश्य प्रचार या अन्य तरीके से कोई किसी की धार्मिक भावनाओं या विश्वास को अपमानित करता है तो उसे गिरफ्तार किया जा सकता है | यह धारा इस कृत्य को अपराधी बनाती है |
धारा 295ए ब्रिटिशकाल में वर्ष 1923 में जोड़ी गई थी और आज़ादी के बाद 1950 में इसमें “सम्राट की प्रजा” शब्द को हटा कर ‘भारतीय नागरिक’ शब्द जोड़ें गये | कानून विशेषज्ञों के मत में यह धारा भी बोलने की आज़ादी को सीमित करती है | images
सुप्रीमकोर्ट ने धारा 66ए को रद्द करने के लिए अभिव्यक्ति की आज़ादी पर दिए गये दस अमेरिकी फैसले और डॉ. राम मनोहर लोहिया के दो केसों में दिए गये फैसलों को आधार बनाया |
अमेरिकन कम्युनिकेशन एसोसियशन बनाम डाउटस केस में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विचारों पर नियन्त्रण तानाशाह सरकार का कोपिराइट होता है | “यह सरकार का काम नहीं है कि वह नागरिकों को गलतियाँ करने से रोके बल्कि यह नागरिकों का काम है कि वह सरकार को गलतियाँ करने से रोके” |
धारा 66ए के साथ सबसे गड़बड़ बात यह थी कि उसमें किसी टिप्पणी के हानिकारक, मानहानिकारक धार्मिक विद्वेष फैलाने में सहायक या प्रताड़ित करने वाली होने पर मामला दर्ज करने का प्रावधान था | मुश्किल यह है कि इस शब्दावली की मनमानी व्याख्या संभव है | यह मनमानी व्याख्या की सुविधा ही वह आकर्षण है, जिसकी वजह से सरकारें इस कानून को छोड़ना नहीं चाहती थीं | कई नेताओं ने बहुत सामान्य सी टिप्पणियों पर आपत्ति जताई और उनके इशारे पर ही पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर लिया | यह सही है कि साइबर विश्व में काफी गंदगी और राजनीति है, लेकिन इसका समाधान यह नहीं है कि नेताओं के इशारे पर अभ्व्यक्ति का गला घोंटा जाए |
• इस मुद्दे पर पहली जनहित याचिका 2012 में विधि छात्रा श्रेया सिंघल ने दायर की थी |
• शाहीन ढाडा ने बाल ठाकरे के निधन के बाद मुंबई में बंद के खिलाफ टिप्पणी पोस्ट की थी और रेणु श्रीनिवासन ने उसे लाइक किया था |
ये भी हुए शिकार:
• अप्रैल 2012: अन्बिकेश महापात्र और सुब्रत सेनगुप्त, जादवपुर कारण: ममता बनर्जी के कार्टून को प्रसारित करने पर गिरफ्तारी हुई |
• मई 2012: मुंबई में एयर इंडिया के कर्मचारी ने प्रधानमंत्री और अन्य नेताओं पर अपमानजनक जोक शेयर करने पर गिरफ्तार किया गया था |
• अक्तूबर 2012: पांडेचेरी के व्यापारी रविकृष्णन को ट्विटर पर चिदम्बरम के बेटे के विरुद्ध आपत्तिजनक सन्देश लिखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया |
• अगस्त 2013:  लेखक कंवल भारती को फेसबुक पर उत्तरप्रदेश सरकार की आलोचना पर गिरफ्तार किया गया |
• अगस्त २०१४: केरल में भाकपा कार्यकर्ता रजिश कुमार को प्रधानमंत्री के खिलाफ फेसबुक पर अभद्र टिप्पणियाँ पोस्ट करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया |
• मार्च २०१५: रामपुर के बरेली में 11वीं कक्षा के छात्र को शहरी विकास मंत्री आजम खान के विरुद्ध ‘आपत्तिजनक’ पोस्ट डालने के आरोप में गिरफ्तार किया गया |
क्या है धारा 66ए
• जो सूचना सरासर आक्रामक या चरित्र हनन करने वाली हो |
• व्यक्ति जानता हो कि उसके द्वारा भेजी गई सूचना गलत है लेकिन दूसरे व्यक्ति को खिजाने, परेशान करने, खतरे में डालने, अपमानित करने, दुश्मनी, बुरे इरादे के साथ कम्प्यूटर या किसी अन्य संचार उपकरण के जरिये ऐसी सूचना भेजता है |
कुछ प्रमुख लोगों के वक्तव्य:index

• यह निर्णय बहुत जरुरी था | यह कानून बहुत ही अस्पष्ट और भ्रमित करने वाला था जिसका शिकार लोग हो रहे थे |
***प्रशान्त भूषण
• यह धारा पूरी तरह असंवैधानिक थी | यह धारा बेहद लचर थी, ऐसे में इसके दुरूपयोग की संभावनाएँ हमेशा बनी रहती थी और कई मौकों पर ऐसा होता भी रहा है |
***पी. चिदंबरम
• धारा 66ए का मैं सदैव विरोध करता रहा हूँ | केवल धारा 66ए ही नहीं मैंने सुप्रीमकोर्ट में धारा 499 एवं 500 की संवैधानिकता को चुनौती दी है | सुप्रीमकोर्ट ने केन्द्र से जबाब माँगा है | परिणाम सुखद ही रहने वाला है |
**डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी

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2 Comments

  1. Anil Jharotia says:

    Very nice information regarding Social media user. It is right step of SC.

  2. Anil Jharotia says:

    -डॉ. अंजनी झा

    Very nice information…..right step of SC