अफगानिस्तान में चीन, इसके क्या होंगे परिणाम


डॉ. सतीश कुमार

images1 अफगानिस्ता के मुद्दे पर चीन नई भूमिका कई बुनियादी प्रश्नों को जन्म देता है। पिछले दो तीन वर्षों से चीन अफगानिस्तान में शांति बहाली की प्रक्रिया में लगा हुआ है । 30 जुलाई को चीन के सिक्यिांग राज्य में अफगानिस्तान सरकार, अनगिनत खण्डों में बंटे हुए तालिबानी समूह और पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था आई.एस.आई के प्रमुख के साथ बैठक होनी थी । इसी बीच अफगानिस्तान सरकार ने इस बात का रहस्योद्घाटन कर दिया की तालिबान प्रमुख की हत्या दो वर्ष पूर्व पाकिस्तान में हो चुकी है । अफगानिस्तान की नब्ज को टटोलने वाले बखूबी जानते थे कि उमर, तालिबान सरगना एक अदृश्य छवि बनाकर क्रूर आंतकी गतिविधियों को अंजाम देता था । मीडिया और खबरों से महरूम बनकर उमर एक ऐसी जिदंगी जीता था जिसे दुनिया पहचान न सके । शायद इसलिए भी अमेरिकी हमलों से बचा जा सके ।

कारण जो भी रहा हो, तालिबान सरगना की मरने की पुष्टि होने के बाद अफगानिस्तान की स्थिति पुन: भयावह बन सकती है । हिसंक गतिविधियों में बेतहासा वृद्धि होने की उम्मीद है । तकरीबन तालिबान के ढाँचे में ही 60 से ज्यादा खंड है, जिनकी सोच और काम करने के तौर-तरीके में बुनियादी अंतर है । 1990 के दौरान तालिबान एक महाशक्ति के रूप में अफगानिस्तान के दक्षिण-पश्चिम इलाकों में, पुन: सम्पूर्ण अफगानिस्तान में विस्तार किया, वह मुल्ला उमर की ठोस नेतृत्व और रणनीति का नतीजा था । अदृश्य तरीके से इस व्यक्ति की पकड़ तकरीबन सभी समूहों पर थी । हर रंग के तालिबानी उनको अपना नेता मानते थे । इसलिए आज के तालिबान के पास कद्धावर नेता नहीं है जिसकी बात हर कोई मान सके । न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार 2015 तक अमेरिकी सेनाओं की वापसी से सुरक्षा व्यवस्था पहले से लचर हो चुकी है । दूसरी तरफ तालिबान के भीतर युवाओं की भीड़ ने पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह से तोड़ने का मन बना लिया है । नई व्यवस्था में आक्रोश और चरमपंथी वैचारिक आग ज्यादा है । यही कारण है कि पिछले कुछ दिनों में तालिबानी हमले के शिकार महज वहाँ की पुलिस और सेना ही नही बन रही है बल्कि हिसंक हमले रिहायशी इलाकों में किए जा रह है जिसमें सैकड़ों आम नागरिकों की जाने जा रही है ।

ऐसे माहौल में चीन की कूद फान एक नए समीकरण में जन्म देगा । 2001 से लेकर 2013 तक चीन की भूमिका अफगानिस्तान में एक बैंक बेंचर के रूप में रही है । चीन अपने बड़े भूभाग सिक्यिांग की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए मध्य एशिया में शांति की स्थिति को बहाल करना चाहता था । लेकिन 2013 के बाद, विशेषकर अमेरिकी निर्णय के उपरांत, कि अमेरिका अफगानिस्तान से अपनी सेना को वापस बुलाना चाहता है, चीन के लिए एक नए समीकरण की शुरूआत बन गई । संभवत: चीन के लिए अफगानिस्तान में ऐसा करना पहला उदाहरण होगा जहाँ चीन महस्थता की भूमिका में दिखाई देगा । दरअसल इस ब्यूहरचना के बीच शुरूआत दो साल पहले हो चुकी थी । चीन तालिबान और अफगानिस्तान के बीच एक शांतिपूर्ण, सोहार्दपूर्ण वातावरण बनाने की कोशिश में है । इसब्यूहरचना की परिकल्पना पाकिस्तान की सेना और पाकिस्तान की गुप्तचर एंजेसी आई एसआई के नक्शे कदम पर बनाई गई है । हैरत अंग्रेज बात यह है कि चीन जिस आग को हवा दे रहा है वही आग उसके आंगन में भी फैल चुकी है । प्रमाणिक सूत्रों के अनुसार 2013 से 15 के बीच सैकड़ों यूगूर अतिवादी मुस्लिम चरमपंथियों को तथाकथित इस्लामिक देश बनाने की कोशिश में जुटे, जत्थों को, अफगानिस्तान की सेना चीन को सौंप चुकी है । इन लोगों की पाक-अफगान सीमा से पकड़ा गया जहाँ उन्हें प्रशिक्षण दिया जा रहा था ।

यह प्रश्न का उत्तर जानना अत्यंत ही रोचक है कि आखिरकार चीन पाकिस्तान के साथ मिलकर अफगानिस्तान कैसे और किस तरह की शांति की पहल कर रहा है ? क्या चीन को इस प्रयास में सफलता मिलने की उम्मीद है । अर्से से अफगानिस्तान की समस्या पर चीन को सोच और भूमिका सिक्यिांग राज्य से जुड़ी हुई थी, बहुत हद तक आज भी वह कारण बहुत महत्वपूर्ण है । चीन- अफगानिस्तान की सीमा महज 92 कि.मी. की है । जबकि सिक्यिंग प्रदेश तीन महत्वपूर्ण मध्य एशिया के राज्यों से मिलता है । अफगानिस्तान की सीमाएँ मध्य एशिया के राज्यों से मिलती है । सोवियत संघ से अलग होने के उपरांत मध्य एश्यिा के राज्यों में इस्लामिक चरमपंथियों का उबाल काफी तेज था । विशेषकर तजाकिस्तान ओर उजबेकिस्तान में । 90 के दशक में ही अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा पूरे मध्य एशिया के लिए खतरे की घंटी बन गई । ट्रकी, ईरान ओर मध्य पूर्व के देश इस नए समीकरण से प्रभावित होने लगे । पाकिस्तान इसे पूरे परिक्रम ध्रुव केन्द्र बन गया । प्रशिक्षण से लेकर रसद पानी पाकिस्तान के द्वारा अफगानिस्तान में पहुँचाया जाने लगा । 2001 के बाद नाटो की सेना ने घेराबंदी शुरू की तो पता चहा कि तालिबान का प्रशिक्षण केन्द्र पाकिस्तान ही है । पुन: अमेरिका ने पाकिस्तान पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया । पाकिस्तान ने अपना पला बदलना शुरू कर दिया । चीन-पाकिस्तान गठबंधन कश्मीर मुद्दे पर पहले से ही भारत विरोधी थी । पाकिस्तान ने चीन के नेताओं को यह विश्वास दिलाने में सफल हो गया कि नाटो की वापसी के बाद चीन इस पूरे क्षेत्र का निसंकट बादशाह बन सकता है ।

14वीं शताब्दी का विश्व प्रसिद्ध भ्रमण कारी मार्कपोलो ने इस क्षेत्र की यात्रा के दौरान अपनी डायरी में यह लिखा था कि “जो भी राज्य इन क्षेत्रों पर कब्जा कर लेता है, वह एशिया का मालिक होगा और जो एशिया का मालिक होगा उसके कदमों पर दुनिया होगी । तैमूर लंग और मुगल सल्तनत इस बात की पुष्टि करते है । 20 वी शताब्दी के आरंभ में ग्रेट गेम जो ब्रिटिश साम्राज्य और पूर्व सोवियत संघ के बीच लड़ा गया । आज चीन की तैयारी मार्क पोलो के शब्दों को याद दिलाता है ।

चीन आज अफगानिस्तान में महज सिक्यिांग राज्य की सुरक्षा और अमन चैन के कारण मध्यस्थता की भूमिका के लिए उतारू नहीं हुआ है । बल्कि चीन की भावी विश्व विजेता बनने की योजना का एक महत्वपूर्ण कड़ी है । इसके पहले विश्व शक्तियाँ राजनीतिक मुद्दे और सामरिक समीकरण को ठोस बनाने के लिए अखाड़े में उतरते थे, लेकिन चीन ने अखाड़े के नियम बदल दिए । चीन का सिल्क रूट वन रोड-वन बेल्ट की भावी योजना में अफगानिस्तान की भूमिका अत्यंत ही महत्वपूर्ण है । चीन मध्य एशिया और मध्य पूर्व एशिया में संचित खनिज पदाथें को अपने कब्जे में करना चाहता है । चूँकि दक्षिण पूर्व एशिया के देश चीन से डरे और उबे हुए है । ताईवान के मुद्दे पर चीन अमेरिकी सोच से भली भांति परिचित है । इसलिए चीन एन घरौदों को जो अमेरिकी चंगुल से बाहर निकल चुका है, कब्जा बनाने की कोशिश में है । images3
पाकिस्तान की गुप्तचर संस्था और सेना की भूमिका चीन की मध्यस्थता में अत्यंत ही महत्वपूर्ण है । चीन के पास साधन और पैसे है पाकिस्तान की सेना भौगोलिक रूप से अफगानिस्तान के चप्पे-चप्पे से मुखबिर है । साथ ही अफगानिस्तान के नए राष्ट्रपति असरफ घनी को यह उम्मीद है कि चीन की मुखालफत ही अमन चैन की व्यवस्था बना सकती है । यह परिवर्तन भारत के लिए प्रतिकूल परिस्थितियों का निर्माण करेगा । पाकिस्तान का एक मात्र लक्ष्य भारत विरोध का रहा है । अफगानिस्तान में भी पाकिस्तान चुहा बनकर शेर की सवारी करना चाहता है जहाँ से भारत की विकासवादी गति को रोक दिया जाए । उल्लेखनीय है कि भारत अफगानिस्तान के नव निर्माण में एक महत्वपूर्ण सहयोगी की भूमिका । निभा रहा है, जिसकी प्रशंसा न केवल दुनिया कर चुकी है बल्कि अफगानी भी इस बात से रू-ब-रू है ।

महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि चीन-पाकिस्तान की जोड़ अफगानिस्तान में चल पाएगी । चीन के आधिकारिक पत्र ने इस्लाम को अत्यंत क्रूर विध्वंशक कहा है । पाकिस्तान पूर शीत युद्ध के दौरान एक ‘मुलायम इस्लामिक देश’ के रूप में अमेरिका और पश्चिमी देशों का चहेता बना रहा । जब स्वार्थ टकराए तो अमेरिका ने केचुल की तरह पाकिस्तानका त्याग कर दिया । चीन पहले से ही इस्लामिक आतंक से परिचित है । चीन यह जानता है कि इस्लामिक आतंकवाद का भू केन्द्र पाकिस्तान ही है । ऐसे हालात में दोनों देशों की मिली भगत कब तक चल पाएगी ।

 (लेखक झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय में अन्तराष्ट्रीय संकाय के विभागाध्यक्ष हैं।) 

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