अपसंस्कृति की धुन पर बहते कदम


डॉ. विनोद बब्बर

गत सप्ताह ग्रेटर नोएडा में हुए मां-बेटी की हत्या के समाचार से प्रथम दृष्टया कानून व्यवस्था के विरूद्ध मन में रोष होना स्वाभाविक था। लेकिन जब यह खुलासा हुआ कि हत्यारा कोई और नहीं बल्कि 15 साल का अपना ही बेटा है तो इस रोष की दशा बदलनी चाहिए। मन परेशान होना चाहिए कि आखिर ये क्या और क्यों हो रहा है? अपने बच्चे को 9 महीने गर्भ रखने वाली, खुद गीले में सोकर उसे सूखे में सुलाने वाली मां अगर अपने बेटे को पढऩे के लिए कहे या किसी बात पर डांटे तो यह इतना बड़ा अपराध कि नाबालिग बेटा सोई हुई अपनी मां पर कैंची और पिज्जा कटर से प्रहार करे। बहन जाग जाये तो उसे भी बेरहमी से मार डाले। यह सब कल्पना की उड़ान या पुलिसिया कहानी नहीं है बल्कि घर में लगे सीसीटीवी में दर्ज है कि रात 8ः16 मिनट पर बेटा मां और बहन के साथ बाजार से लौटता है तो रात 11ः 15 मिनट बदले हुए कपड़ो में पीठ पर बैग और हाथ में मोबाइल लिये घर से निकलता है। मां और बहन के प्रति निर्दयता बरतने वाला वह नरपशु अपने आवासीय परिसर के गार्ड से हाथ मिलाता है और गाड़ी में बैठकर चला जाता है। बताया जाता है कि हर समय मोबाइल से चिपटे रहने वाला यह मातृद्रोही गुस्सैल है। छोटी-छोटी बातों पर भी अक्सर झगड़ पड़ता है। बहन पढ़ाई में अव्वल आती है तो उसे बहन की प्रशंसा चुभती है। मां उसे भी योग्य बनने के लिए कहे यह उसे स्वीकार नहीं था इसलिए उसने बांस और बांसुरी दोनो ही खत्म कर दिये।
ओह आखिर कहां जा रहे हैं? पिता को परिवार की जरूरते पूरी करने के लिए कमाने बाहर जाना पड़ता है। पर नालायक बेटे ने तो परिवार को ही पूरा कर दिया। पाषाण काल से आधुनिक सभ्यता तक का सफर मानवीय संबंधों के परस्पर प्रेम और आकर्षण की गाथा है। आदिमानव से परिवार और समाज की ओर बढ़ना रिश्तों के कारण हीं संभव हुआ, जिसने दुनिया की तस्वीर ही बदल दी। अपने परिवार और निकटजनों के जीवन को सुखकर बनाने के लिए, तो कभी रिश्तों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता सिद्ध करने के लिए मनुष्य ने क्या नहीं किया। ‘आसमान से तारे तोड़ लाने’ की बात अकारण नहीं है। वास्तव में, आज की समस्त भौतिक सुख-सुविधाएं और नित नये आविष्कार मानवीय संबंधों से, संबंधों द्वारा, संबंधों के लिए ही तो है। दुनिया से अलग -थलग व्यक्ति को धन कमाने, महल खड़ा करने और नये -नये आविष्कारों के लिए इतना परेशान होने की जरूरत ही नं थी। संबंधों की इतनी महिमा होते हुए भी इन्हीं की नींव पर खड़ा समाज और उसकी मर्यादा, शांति खतरे में है।
इसी सप्ताह तेज गेंदबाज जसप्रीत बुमरा के दादा बहु द्वारा उपेक्षा किये जाने पर दुखी होकर साबरमती नदी में छलांग लगाकर आत्महत्या करते हैं। यह जानकारी भी प्राप्त हुई हे कि उनकी आर्थिक हालत अत्यंत खराब थी। वे किसी से उधार लेकर पोते से मिलने अहमदाबाद पहुंचे पर ….! इधर भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली और अभिनेत्री अनुष्का शर्मा की शादी की बहुत चर्चा है लेकिन इस अवसर पर अनुष्का की दादी को बुलाना तो दूर उन्हें सूचना भी सोशल मीडिया से मिलती है। मां-बहन के हत्यारे को नाबालिग कहा जा सकता है लेकिन ये दोनो तो शायद बालिग ही है।
ऐसी घटनाएं और भी हैं जो लगातार समाचार-पत्रों में स्थान पा रही हैं। सभी का उल्लेख शर्मिंदा करता है। ये घटनाएं परिवार नामक संस्था पर कलंक हैं, जहाँ रिश्ते की पवित्रता और गरिमा की खातिर अपना सर्वोच्च बलिदान देने तक से संकोच नहीं किया जाता। विचारणीय है कि आखिर, फिज़ां में ऐसा क्या ज़हर घुल गया है कि लोग रिश्तों की मर्यादा भूल संवेदनशून्य हो रहे हैं। रिश्तो के सम्मान के लिए अपनी जान तक दी जाती थी, आज जान लेने का सिलसिला क्यों? आखिर, खून के रिश्तों को स्वार्थ की काली छाया कलंकित क्यों कर रही है, क्यों सफेद हो रहा है हमारा अपना खून?
‘खून पुकारता है!, ‘खून पानी से गाढ़ा होता है’, ‘अपना-अपना होता है’ जैसे अनेक जुमले अचानक थोथे क्यों दिखाई देने लगे? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम अपने संास्कृतिक मूल्यों की अनदेेखी कर रहे हैं अथवा उन्हें व्यवहार में उतारने की बजाय केवल उनके गीत गाने तक ही सीमित हैं? इन घटनाओं में यदि हम कन्या भ्रूण-हत्याओं और वैवाहिक संबंधों में बढ़ती दरार को भी शामिल कर दें, तो तस्वीर काफी भयावह दिखाई देने लगेगी। इस जहरीले वातावरण का दोषी कौन है और इसका समाधान क्या है?
ये प्रश्न हम सभी के हृदय को आन्दोलित करने चाहिए। आखिर रिश्तों के बीच कैक्टस कौन बो रहा है? किसकी नजर लगी है, मेरे देश को। इन प्रश्नों के उत्तर के लिए अपने अंतर्मन को भी टटोलना होगा। क्या हम संबंधों के प्रति ईमानदार हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि यह टीवी चैनलों पर परोसी जा रही तड़क-भड़क, विकृत संस्कृति, कामुकता, विवाहेतर संबंधों को अनदेखा करने के परिणाम हैं?
अगर हमें इसकी रत्ती-भर भी परवाह हैं तो हमे स्वीकार करना पड़ेगा कि यह सब संस्कार-विहीनता के उपउत्पाद हैं। ऐसे आत्मकेन्द्रित लोग हिंसक होकर अपनों की जान लेने तक उतर आते है। यह भोगवाद और भौतिकता की मृग-मरीचिका का प्रभाव है कि ये लोग निज सुख-सुविधाओं और अहम के आगे सोचते ही नहीं जबकि हमारे सद्ग्रन्थ हमें त्यागपूर्वक भोग की शिक्षा देते हैं। पूरे वातावरण को कलुषित करने वाली ऐसी घटनाएं हमारी शिक्षा प्रणाली को नैतिक शिक्षा से विमुख करने के प्रति सावधान करती है। नैतिकता कट्टरता या भगवाकरण नहीं बल्कि मानवीय मूल्य हैं जो हमें सिखाती है कि समाज में एक दूसरे के प्रति संवेदना होनी चाहिए। अनजान की मदद करने के लिए भी हमें खुद-बखुद आगे आना चाहिए। अगर ऐसा गलत नहीं है तो फिर ऐसे श्रेष्ठ संस्कार राष्ट्र की नई पीढ़ी में कैसे रोपित किये जाएं, यह चिंता सभी को होनी चाहिए।
यह सर्वविदित है कि आज परिवार टूट रहे हैं। संयुक्त परिवार एकाकी हो रहे हैं। यह भी शर्मनाक परन्तु सत्य है कि अब परिवार तो क्या, उसका हर सदस्य भी एकाकी हो चला है। कुछ लोग पैसे की चमक -दमक और आत्म-केंद्रित सोच को पारिवारिक तनाव और कटूता का कारण मानते हैं। यदि सचमुच ऐसा है, तो यह कैसी उन्नति है, जिसमें मनुष्य में मनुष्यता का लगातार पतन हो रहा है?
क्या आपका मन आपसे यह प्रश्न नहीं करता कि आखिर कहाँ पहुँच गये हैं हम और हमारा समाज? आपसी संबंधों में तनाव की परिणति हिंसा में होना सचमुच सिहरन पैदा करता है। इसके अनेक कारण हो सकते हैं। आज, हम एक ऐसे समाज का अंग बनते जा रहे हैं जहाँ हर आदमी आत्मकेंद्रित है। उसमें स्वार्थ कूट-कूटकर भरा है। कोई किसी की बात ही नहीं सुनना चाहता। अब, हर समय तो कोई आपकी प्रशंसा, स्तुति, वंदना नहीं कर सकता, गलत को गलत भी कहना पड़ता है। यदि परिवार के किसी एक सदस्य को अधिक धन अथवा यश प्राप्त होता है, तो बाकी सदस्य उसे ईर्ष्या के रूप में क्यों ले? नशे का बढ़ता चलन भी खतरनाक है। आज, हर शादी पार्टी में नशे का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। कुछ लोग नशें में सुध-बुध खोकर संबंधों की मर्यादा को भी भूल जातेे हैं। आज नशे के बदलते हुए रूप सामने आ रहे हैं। दौलत का नशा, रूप का नशा, सत्ता का नशा, योग्यता का नशा, ऊँचे संबंधों का नशा, जब और कोई नशा नहीं हो, तो अहम का नशा।
क्या यह कटु सत्य नहीं कि आज हम बड़ी-बड़ी बातंे तो कर सकते हैं परन्तु, उपसंस्कृति के विरुद्ध एक भी कदम उठाते हुए हमारे पाँव cकाँपने लगते हैं। यदि हम अब भी नहीं चेते, अपने आपको संस्कारित ढ़ाँचे में नहीं ढाला, तो बहुत संभव है कि रिश्तों पर पानी फेरती घटनाओं का अगला शिकार हम ही हों।

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